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Class 10 history Notes in hindI Chapter - 4

Chapter 4: The Age of Industrialisation
Chapter Introduction: 
This chapter focuses on the development of industries and factories during the industrial revolution. It explains how industrialisation affected society, workers, and economies. The question–answer format makes complex topics easier to understand.

FAQ
Ques. Are case-study based questions asked from this chapter?
Ans. Yes, this chapter often includes case-study and descriptive questions in exams.

CLASS 10 HISTORY NOTES IN HINDI
CHAPTER 4 : औद्योगीकरण का युग

प्रश्न :- औद्योगीकरण का युग किसे कहते हैं?

उत्तर :- औद्योगीकरण :- वह युग जिसमें हस्तनिर्मित वस्तुओं का निर्माण घट गया और फैक्टरियों, मशीनों तथा तकनीक का तेजी से विकास हुआ, उसे औद्योगीकरण का युग कहते हैं। इस समय खेती करने वाला समाज औद्योगिक समाज में परिवर्तित हो गया।

औद्योगीकरण के  युग के विषय में मुख्य बिंदु निम्नलिखित है :-  

1. हस्तनिर्मित वस्तुओं की जगह मशीनों से वस्तुएँ बनने लगीं।

2. तकनीकी विकास के कारण उत्पादन में तेजी आई।

3. समाज की संरचना कृषि आधारित से औद्योगिक रूप में बदल गई।

4. यह काल लगभग 1760 से 1840 तक माना जाता है।

उदाहरण :-

ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति के दौरान कपड़ा उद्योग, लोहा और कोयले के उद्योगों का तेजी से विकास हुआ।

प्रश्न :- पूर्व औद्योगीकरण किसे कहते हैं?

उत्तर :- पूर्व औद्योगीकरण :- यूरोप में औद्योगीकरण शुरू होने से पहले के समय को पूर्व औद्योगीकरण का काल कहा जाता है। दूसरे शब्दों में, जब यूरोप में अभी कारखाने स्थापित नहीं हुए थे और वस्तुओं का निर्माण गाँवों में होता था, उसी अवधि को पूर्व औद्योगीकरण कहा जाता है। इस समय गाँवों में बनाए गए सामानों को शहरों के व्यापारी खरीदकर बेचते थे।

पूर्व औद्योगीकरण के विषय में मुख्य बिंदु निम्नलिखित है :-  

1. यह काल कारखानों के बनने से पहले का था।

2. उत्पादन गाँवों में कारीगरों और बुनकरों द्वारा किया जाता था।

3. व्यापारी इन वस्तुओं को खरीदकर बाजार में बेचते थे।

उदाहरण :-

इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति से पहले ग्रामीण परिवार ऊन, सूत और कपड़ा बनाकर शहर के व्यापारियों को बेचते थे — यही काल पूर्व औद्योगीकरण कहलाया।

प्रश्न :- आदि औद्योगीकरण किसे कहते हैं?

उत्तर :- आदि औद्योगीकरण :- इंग्लैंड और यूरोप में फैक्ट्रियों की स्थापना से पहले भी जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार के लिए बड़े पैमाने पर वस्तुओं का उत्पादन किया जाने लगा था, उस काल को आदि औद्योगीकरण कहा जाता है। इस समय उत्पादन फैक्ट्रियों में नहीं, बल्कि लोगों के घरों और छोटे कार्यशालाओं में होता था। इसलिए इतिहासकारों ने औद्योगीकरण के इस चरण को आदि औद्योगीकरण का नाम दिया है।

आदि औद्योगीकरण  के विषय में मुख्य बिंदु निम्नलिखित है :-  

1. यह काल फैक्ट्री व्यवस्था से पहले का औद्योगिक चरण था।

2. उत्पादन बड़े पैमाने पर परंतु घरों और कार्यशालाओं में होता था।

3. इसका उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए वस्तुएँ तैयार करना था।

4. इतिहासकार इस काल को “आदि-औद्योगीकरण” कहते हैं क्योंकि इसने आगे चलकर फैक्ट्री आधारित औद्योगीकरण की नींव रखी।

उदाहरण :-

फैक्ट्रियों के आने से पहले यूरोप के गाँवों में ऊन और कपड़ा बुनने का कार्य बड़े पैमाने पर होता था — यही आदि औद्योगीकरण का उदाहरण है।

प्रश्न :- व्यापारियों ने गाँवों की ओर ध्यान क्यों दिया?

उत्तर :- शहरों में ट्रेड और क्राफ्ट गिल्ड बहुत शक्तिशाली थे, जो प्रतिस्पर्धा और कीमतों पर नियंत्रण रखते थे। ये संगठन नए व्यापारियों को बाजार में प्रवेश नहीं करने देते थे। इसलिए व्यापारियों के लिए शहरों में नया व्यवसाय शुरू करना कठिन था, इसी कारण उन्होंने गाँवों की ओर ध्यान देना शुरू किया।

व्यापारियों ने गाँवों की ओर ध्यान निम्नलिखित कारणों की वजह से दिया :-  

1. शहरों में ट्रेड और क्राफ्ट गिल्ड बहुत प्रभावशाली थे।

2. गिल्ड संगठन प्रतिस्पर्धा और कीमतों को नियंत्रित करते थे।

3. नए व्यापारियों को बाजार में काम शुरू करने से रोका जाता था।

4. गाँवों में ऐसी पाबंदियाँ नहीं थीं, इसलिए व्यापारी वहाँ चले गए।

उदाहरण :-
व्यापारी गाँवों में जाकर बुनकरों और कारीगरों से वस्तुएँ बनवाते थे, क्योंकि वहाँ उन्हें गिल्ड जैसी रोक-टोक का सामना नहीं करना पड़ता था।

प्रश्न :- स्टेपलर किसे कहा जाता है?

उत्तर :- स्टेपलर :- वह व्यक्ति जो ऊन को उसके रेशों की गुणवत्ता और लंबाई के अनुसार छाँटता या वर्गीकृत करता है, उसे स्टेपलर कहा जाता है।

स्टेपलर की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित है :- 

1. स्टेपलर ऊन के रेशों को अलग-अलग श्रेणियों में बाँटता है।

2. यह कार्य वस्त्र उद्योग में कच्चे माल की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है।

उदाहरण :-

इंग्लैंड में वस्त्र उद्योग के विकास के दौरान स्टेपलर ऊन को छाँटकर व्यापारियों को बेचते थे।

प्रश्न :- फुलर किसे कहा जाता है?

उत्तर :- फुलर :- वह व्यक्ति जो कपड़े को ‘फुल’ करता यानी चुन्नटों या अन्य तरीकों से कपड़े को समेटकर मजबूत और चिकना बनाता है, उसे फुलर कहा जाता है।

फुलर की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित है :- 

1. फुलर कपड़े को समेटने और चिकना बनाने का कार्य करता है।

2. यह प्रक्रिया कपड़े की मजबूती और गुणवत्ता बढ़ाने के लिए की जाती है।

3. वस्त्र उद्योग में फुलर का काम खास महत्व रखता था।

उदाहरण :-

पुराने समय में ऊनी कपड़े को पहनने योग्य और टिकाऊ बनाने के लिए फुलर उसे बार-बार फुल करता था।

प्रश्न :- कार्डिंग किसे कहा जाता है?

उत्तर :- कार्डिंग :- वह प्रक्रिया जिसमें कपास, ऊन या अन्य रेशों को कताई के लिए तैयार किया जाता है, उसे कार्डिंग कहते हैं।

कार्डिंग की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित है :- 

1. कार्डिंग रेशों को अलग-अलग करके उन्हें सीधा और चिकना बनाती है।

2. यह कताई की तैयारी का महत्वपूर्ण चरण है।

3. वस्त्र उद्योग में गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए कार्डिंग आवश्यक है।

उदाहरण :-

उनी ऊन को कताई से पहले कार्डिंग मशीन में डालकर रेशों को सीधा और साफ किया जाता था।

प्रश्न :- कारखानों की शुरुआत कब और कहाँ हुई?

उत्तर :- कारखानों की शुरुआत :- सबसे पहले इंग्लैंड में 1730 के दशक में कारखाने बनना शुरू हुए। अठारहवीं सदी के अंत तक पूरे इंग्लैंड में जगह-जगह कारखाने दिखाई देने लगे। इस नए युग का पहला प्रतीक कपास था, और उन्नीसवीं सदी के अंत तक कपास के उत्पादन में भारी बढ़ोतरी हुई।

कारखानों के विषय में मुख्य बिंदु निम्नलिखित है :-  

1. 1760 में ब्रिटेन में 2.5 मिलियन पाउंड कपास का आयात हुआ।

2. 1787 तक यह मात्रा बढ़कर 22 मिलियन पाउंड हो गई।

3. कारखाने उद्योग और कपास उत्पादन में नए युग की शुरुआत का प्रतीक बने।

उदाहरण :-

इंग्लैंड के विभिन्न क्षेत्रों में कारखानों की स्थापना हुई और कपास उद्योग तेजी से विकसित होने लगा।

प्रश्न :- कारखानों से क्या लाभ हुए?

उत्तर :- कारखानों से लाभ  :- कारखानों के खुलने से कई फायदे हुए। श्रमिकों की कार्यकुशलता बढ़ गई और नई मशीनों की सहायता से प्रति श्रमिक अधिक मात्रा में और बेहतर उत्पाद बनने लगे। औद्योगीकरण की शुरुआत मुख्य रूप से सूती कपड़ा उद्योग में हुई। साथ ही, कारखानों में श्रमिकों की निगरानी और उनसे काम लेना अधिक आसान हो गया।

कारखानों से निम्नलिखित लाभ हुए :- 

1. श्रमिकों की कार्यकुशलता में वृद्धि हुई।

2. मशीनों के कारण उत्पादन की मात्रा और गुणवत्ता दोनों बढ़ीं।

3. औद्योगीकरण की शुरुआत सूती कपड़ा उद्योग से हुई।

4. कारखानों में श्रमिकों की निगरानी और प्रबंधन आसान हुआ।

उदाहरण :-

इंग्लैंड में नए कारखानों में मशीनों की मदद से ज्यादा और बेहतर कपड़ा उत्पादन होने लगा।

प्रश्न :- औद्योगिक परिवर्तन की रफ्तार कैसी थी?

उत्तर :- औद्योगीकरण का मतलब केवल फैक्ट्री उद्योग का विकास नहीं था। कपास और सूती वस्त्र उद्योग, साथ ही लोहा और स्टील उद्योग में भी बदलाव तेजी से हुए, और ये ब्रिटेन के सबसे फलते-फूलते उद्योग थे। औद्योगीकरण के पहले दौर में (1840 के दशक तक) सूती कपड़ा उद्योग अग्रणी क्षेत्रक था। रेलवे के प्रसार के बाद लोहा-इस्पात उद्योग में तेजी आई। इंग्लैंड में रेल का प्रसार 1840 के दशक में हुआ और उपनिवेशों में 1860 के दशक में। 1873 तक ब्रिटेन से लोहा और इस्पात के निर्यात की कीमत 77 मिलियन पाउंड हो गई, जो सूती कपड़े के निर्यात का दोगुना था।

लेकिन औद्योगीकरण का रोजगार पर खास असर नहीं पड़ा। उन्नीसवीं सदी के अंत तक कामगारों का 20% से भी कम हिस्सा तकनीकी रूप से उन्नत औद्योगिक क्षेत्र में नियोजित था। इसका मतलब यह है कि नए उद्योग पारंपरिक उद्योगों को पूरी तरह विस्थापित नहीं कर पाए थे।

औद्योगिक परिवर्तन की रफ्तार के विषय में मुख्य बिंदु निम्नलिखित है :-  

1. औद्योगीकरण सिर्फ फैक्ट्री उद्योग तक सीमित नहीं था।

2. सूती कपड़ा उद्योग पहले दौर में अग्रणी था।

3. रेलवे के प्रसार से लोहा और स्टील उद्योग तेजी से विकसित हुए।

4. 1873 में लोहा-इस्पात का निर्यात सूती कपड़े के निर्यात से दोगुना था।

5. रोजगार पर औद्योगीकरण का प्रभाव सीमित था; अधिकांश कामगार पारंपरिक उद्योगों में ही थे।

उदाहरण :-

1840 के दशक में इंग्लैंड में रेलवे के विस्तार से लोहा-इस्पात उद्योग में उत्पादन बढ़ा, लेकिन श्रमिकों का बड़ा हिस्सा अभी भी पारंपरिक कारीगरी और कृषि कार्य में लगा हुआ था।

प्रश्न :- नए उद्योगपति परंपरागत उद्योगों की जगह क्यों नहीं ले सके?

उत्तर :- नए उद्योगपति परंपरागत उद्योगों की जगह इसलिए नहीं ले सके क्योंकि औद्योगिक क्षेत्र में काम करने वाले मजदूरों की संख्या कम थी, प्रौद्योगिकीय बदलाव की गति धीमी थी, कपड़ा उद्योग एक गतिशील उद्योग था, प्रौद्योगिकी काफी महँगी थी, और उत्पादन का एक बड़ा भाग अभी भी गृह उद्योग से पूरा होता था।

नए उद्योगपति परंपरागत उद्योगों की जगह निम्नलिखित कारणों की वजह से नहीं ले सके :- 

1. औद्योगिक क्षेत्र में मजदूरों की संख्या कम थी।

2. प्रौद्योगिकी का बदलाव धीरे-धीरे हो रहा था।

3. कपड़ा उद्योग गतिशील और प्रतिस्पर्धात्मक था।

4. तकनीकी उपकरण महँगे थे।

5. अधिकांश उत्पादन अभी भी घरों में ही होता था।

उदाहरण :-

ब्रिटेन में 19वीं सदी के अंत तक कई छोटे कारीगर और गृह उद्योग कपड़ा उत्पादन जारी रखते थे, इसलिए नए फैक्ट्री उद्योग पूरी तरह से उन्हें प्रतिस्थापित नहीं कर पाए।

प्रश्न :- हाथ के श्रम और वाष्प शक्ति का उपयोग उस समय क्यों भिन्न था?

उत्तर :- उस समय श्रमिकों की कोई कमी नहीं थी, इसलिए मजदूरों की अधिक लागत या कमी की समस्या नहीं थी। इस कारण महंगी मशीनों में पूंजी लगाने की बजाय श्रमिकों से काम लेना बेहतर समझा जाता था। मशीन से बनी चीजें हाथ से बनी चीजों की गुणवत्ता और सुंदरता का मुकाबला नहीं कर सकती थीं, और उच्च वर्ग के लोग हाथ से बनी चीजों को अधिक पसंद करते थे।

लेकिन उन्नीसवीं सदी के अमेरिका में श्रमिकों की कमी के कारण मशीनीकरण ही एकमात्र विकल्प था।

हाथ के श्रम और वाष्प शक्ति का उपयोग उस समय निम्नलिखित कारणों की वजह से भिन्न था :- 

1. श्रमिकों की कोई कमी नहीं थी।

2. महंगी मशीनों में पूंजी लगाने की बजाय श्रमिकों से काम लेना आसान था।

3. मशीन से बनी वस्तुएँ हाथ से बनी वस्तुओं की गुणवत्ता और सुंदरता नहीं पा सकती थीं।

4. उच्च वर्ग हाथ से बनी चीजों को पसंद करते थे।

5. अमेरिका में श्रमिकों की कमी के कारण मशीनीकरण आवश्यक था।

उदाहरण :-

ब्रिटेन में हाथ से बने कपड़े उच्च वर्ग में लोकप्रिय थे, जबकि अमेरिका में मजदूरों की कमी के कारण मशीनों से बड़े पैमाने पर उत्पादन किया गया।

प्रश्न :- 19वीं शताब्दी में यूरोप के उद्योगपति मशीनों की अपेक्षा हाथ के श्रम को अधिक क्यों पसंद करते थे?

उत्तर :- 19वीं शताब्दी में यूरोप में उद्योगपति हाथ के श्रम को इसलिए अधिक पसंद करते थे क्योंकि ब्रिटेन में मानव श्रम की कोई कमी नहीं थी। मशीनों के लिए अधिक पूँजी निवेश करनी पड़ती थी, इसलिए वे हमेशा मशीनों में निवेश नहीं करना चाहते थे। इसके अलावा, कुछ मौसमी उद्योगों में श्रमिकों द्वारा हाथ से काम करवाना अधिक उपयुक्त माना जाता था। बाजार में अक्सर बारीक डिजाइन और खास आकारों वाली चीजों की माँग रहती थी, जो मुख्यतः हस्त कौशल पर निर्भर थी।

19वीं शताब्दी में यूरोप के उद्योगपति मशीनों की अपेक्षा हाथ के श्रम को अधिक क्यों पसंद निम्नलिखित कारणों की वजह से करते थे :- 

1. ब्रिटेन में मानव श्रम की कोई कमी नहीं थी।

2. मशीनों में अधिक पूँजी निवेश करनी पड़ती थी।

3. मौसमी उद्योगों में हाथ के श्रम को उचित माना जाता था।

4. विशेष डिजाइन और आकार वाली चीजें हस्त कौशल पर निर्भर होती थीं।

उदाहरण :-
ब्रिटेन में बारीक कढ़ाई वाले कपड़े और विशेष आकार के फर्नीचर को हाथ से ही तैयार किया जाता था क्योंकि मशीनें इसकी नक्काशी और गुणवत्ता में प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकती थीं।

प्रश्न :- मजदूरों की जिंदगी कैसी थी?

उत्तर :- मजदूरों की जिंदगी  :- कुल मिलाकर मजदूरों का जीवन दयनीय था। श्रम की बहुतायत के कारण नौकरियों की भारी कमी थी। नौकरी मिलने की संभावना अक्सर दोस्ती, कुनबे या जान-पहचान पर निर्भर करती थी। बहुत सारे उद्योगों में मौसमी काम की वजह से कामगारों को बीच-बीच में लंबे समय तक खाली बैठना पड़ता था। मजदूरों की आय का वास्तविक मूल्य कम होने के कारण उनकी स्थिति गरीबीपूर्ण थी।

मजदूरों की जिंदगी के विषय में मुख्य बिंदु निम्नलिखित है :-  

1. मजदूरों का जीवन दयनीय और कठिन था।

2. नौकरियों की कमी थी और रोजगार जान-पहचान पर निर्भर था।

3. मौसमी काम के कारण बीच-बीच में बेरोजगारी होती थी।

4. आय का वास्तविक मूल्य कम होने के कारण गरीबी थी।

उदाहरण :-

ब्रिटेन में सूती कपड़ा उद्योग में काम करने वाले मजदूरों को कुछ महीनों के लिए ही काम मिलता था और वे खाली समय में किसी अन्य काम की तलाश करते रहते थे, जिससे उनकी गरीबी बनी रहती थी।

प्रश्न :- स्पिनिंग जैनी क्या है?

उत्तर :- स्पिनिंग जैनी :- एक सूत काटने की मशीन है, जिसे जेम्स हारग्रेव्स ने 1764 में बनाया था।

स्पिनिंग जैनी की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित है :- 

1. यह मशीन सूत काटने और कताई की प्रक्रिया को तेज करती थी।

2. एक मशीन से एक समय में कई सूत बनाए जा सकते थे।

3. इसने कपड़ा उद्योग में उत्पादन क्षमता बढ़ाने में मदद की।

उदाहरण :-

ब्रिटेन में सूती कपड़ा उद्योग में स्पिनिंग जैनी के उपयोग से पहले की तुलना में बहुत अधिक सूत का उत्पादन होने लगा।

प्रश्न :- स्पिनिंग जेनी मशीन का मजदूरों ने विरोध क्यों किया?

उत्तर :- उन्नीसवीं सदी के मध्य तक शहरों की आबादी का लगभग 10% अत्यधिक गरीब था। आर्थिक मंदी में बेरोजगारी 35% से 75% तक बढ़ जाती थी। बेरोजगारी की आशंका के कारण मजदूर नई प्रौद्योगिकी से नाराज़ होने लगे। जब ऊन उद्योग में स्पिनिंग जेनी मशीन का इस्तेमाल शुरू हुआ, तो मजदूरों ने मशीनों पर हमला करना शुरू कर दिया।

1840 के दशक के बाद रोजगार के अवसर बढ़े क्योंकि सड़कों को चौड़ा किया गया, नए रेलवे स्टेशन बने और रेलवे लाइनों का विस्तार हुआ।

स्पिनिंग जेनी मशीन का मजदूरों ने विरोध करने क निम्नलिखित कारण थे :-

1. शहरों में गरीबी और आर्थिक असुरक्षा।

2. मंदी में बेरोजगारी का उच्च स्तर।

3. नई प्रौद्योगिकी, जैसे स्पिनिंग जेनी, से मजदूरों का विरोध।

4. 1840 के बाद रेलवे और सड़क निर्माण से रोजगार में वृद्धि।

उदाहरण :-
ब्रिटेन में ऊन उद्योग में स्पिनिंग जेनी मशीनें लगने पर मजदूरों ने इन मशीनों को तोड़ दिया, जिससे उद्योगपतियों और मजदूरों के बीच संघर्ष बढ़ गया।

प्रश्न :- मशीन उद्योग से पहले भारत में कपड़ा उद्योग की क्या स्थिति थी?

उत्तर :- मशीन उद्योग से पहले का भारतीय कपड़ा युग इस प्रकार था :- 

1. अंतर्राष्ट्रीय बाजार में प्रभुत्व :-  भारत के रेशमी और सूती वस्त्रों का विश्व बाजार में दबदबा था।

2. विदेशी व्यापार :- आर्मीनियन और फारसी सौदागर भारत से कपड़े अफगानिस्तान, पूर्वी फारस और मध्य एशिया तक ले जाते थे।

3. मुख्य बंदरगाह :- सूरत, हगली और मसलीपटनम प्रमुख व्यापारिक बंदरगाह थे।

4. व्यापार नेटवर्क :- भारतीय व्यापारी और बैंकर इस व्यापार नेटवर्क में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।

5. व्यापारियों के प्रकार :- दो प्रकार के व्यापारी होते थे :- 

i. आपूर्ति सौदागर  

ii. निर्यात सौदागर

6. मोलभाव की प्रक्रिया :- बड़े जहाज मालिक और निर्यात व्यापारी, दलालों के माध्यम से आपूर्ति सौदागरों से माल खरीदते और कीमत तय करते थे।

उदाहरण :-

सूरत के व्यापारी यूरोपीय व्यापारियों को बढ़िया सूती मलमल और रेशमी कपड़े निर्यात करते थे।

प्रश्न :- मशीन उद्योग के बाद भारत के कपड़ा उद्योग में क्या परिवर्तन हुए?

उत्तर :- मशीन उद्योग (1780 के बाद) के बाद भारत के कपड़ा उद्योग में निम्नलिखित परिवर्तन हुए :-

1. भारतीय नियंत्रण का अंत :- 1750 के दशक तक भारतीय सौदागरों के नियंत्रण वाला व्यापार नेटवर्क टूटने लगा।

2. यूरोपीय कंपनियों का प्रभाव :-  यूरोपीय कंपनियों की शक्ति और प्रभाव तेजी से बढ़ने लगा।

3. पुराने बंदरगाहों का पतन :- सूरत और हुगली जैसे पुराने बंदरगाह कमजोर पड़ गए और उनकी व्यापारिक महत्ता घट गई।

4. नए बंदरगाहों का विकास :- बंबई (मुंबई) और कलकत्ता (कोलकाता) नए प्रमुख बंदरगाहों के रूप में उभरे।

5. व्यापार पर यूरोपीय नियंत्रण :- अब व्यापार यूरोपीय कंपनियों के हाथों में चला गया और यह यूरोपीय जहाजों द्वारा नियंत्रित होता था।

6. कपड़ा व्यापार की स्थिति :- शुरुआती समय में भारतीय कपड़ा व्यापार में कोई कमी नहीं आई, बल्कि 18वीं सदी में यूरोप में भारतीय कपड़ों की भारी मांग बनी रही।

उदाहरण :- 

ब्रिटिश व्यापारी भारतीय सूती मलमल और रेशमी कपड़े को यूरोप के बाजारों में उच्च दाम पर बेचते थे।

प्रश्न :- यूरोपीय कंपनियों के आने से भारतीय बुनकरों की स्थिति में क्या परिवर्तन हुआ?

उत्तर :- यूरोपीय कंपनियों के आने से भारतीय बुनकरों की स्थिति में निम्नलिखित परिवर्तन हुए  :- 

1. यूरोपीय नियंत्रण की शुरुआत :- जैसे-जैसे यूरोपीय कंपनियों का प्रभाव बढ़ा, उन्होंने बुनकरों पर नियंत्रण करना शुरू कर दिया।

2. स्वतंत्रता की हानि :- अब बुनकरों को कंपनी के आदेश पर ही काम करना पड़ता था और उन्हें अपनी मर्जी से कपड़ा बेचने की अनुमति नहीं थी।

3. आर्थिक स्थिति का बिगड़ना :- कंपनी द्वारा तय की गई कम कीमतों पर सामान बेचने के कारण बुनकरों की आय घट गई और उनकी आर्थिक स्थिति खराब हो गई।

उदाहरण :- 

ईस्ट इंडिया कंपनी के एजेंट बुनकरों को अग्रिम धन (दादनी) देते थे और उनसे बाध्य करते थे कि वे कपड़ा केवल कंपनी को ही बेचें।

नोट :-

1. पहले की अच्छी स्थिति :- ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन से पहले बुनकरों की हालत अच्छी थी क्योंकि उनके कपड़ों के बहुत से खरीदार थे।

2. मोलभाव की स्वतंत्रता :- बुनकर अपने उत्पाद को मोलभाव करके सबसे अधिक कीमत देने वाले को बेच सकते थे।

प्रश्न :-  ईस्ट इंडिया कंपनी के आने के बाद भारतीय बुनकरों की स्थिति कैसी हो गई?

उत्तर :- ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा सत्ता स्थापित करने के बाद (1760 के बाद) भारतीय बुनकरों की स्थिति अत्यंत खराब हो गई। इसके निम्नलिखित मुख्य कारण थे :- 

1. व्यापार पर एकाधिकार :- ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीय कपड़ा व्यापार पर पूरा नियंत्रण स्थापित कर लिया।

2. स्थानीय व्यापारियों का अंत :- कंपनी ने कपड़ा व्यापार में सक्रिय भारतीय व्यापारियों और दलालों को हटाकर सीधे बुनकरों पर नियंत्रण कर लिया।

3. अन्य खरीदारों पर रोक :- बुनकरों को किसी अन्य व्यापारी या खरीदार को कपड़ा बेचने की अनुमति नहीं थी।

4. गुमाश्तों की नियुक्ति :- कंपनी ने बुनकरों पर निगरानी रखने के लिए गुमाश्ता नामक वेतनभोगी कर्मचारियों को नियुक्त किया।

5. टकराव और शोषण :- गुमाश्तों के कठोर व्यवहार के कारण बुनकरों और कंपनी कर्मचारियों के बीच अक्सर टकराव होता था।

6. कम कीमतों का दबाव :- कंपनी बुनकरों से बहुत कम दाम पर कपड़ा खरीदती थी, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति दयनीय हो गई।

उदाहरण :-

बंगाल के कई बुनकर कंपनी की शर्तों से परेशान होकर करघे तोड़ने और कपड़ा बुनाई छोड़ने तक मजबूर हो गए।

प्रश्न :- भारत में मैनचेस्टर के आने से भारतीय कपड़ा उद्योग पर क्या प्रभाव पड़ा?

उत्तर :- उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में मैनचेस्टर के कपड़ों के भारत में आने से भारतीय कपड़ा उद्योग को भारी नुकसान हुआ। इसके कारण और प्रभाव निम्नलिखित थे :- 

1. भारतीय कपड़ों के निर्यात में गिरावट :- 1811-12 में भारत से निर्यात होने वाले सूती कपड़ों की हिस्सेदारी 33% थी, जो 1850-51 तक घटकर मात्र 3% रह गई।

2. ब्रिटिश सरकार द्वारा आयात शुल्क :- ब्रिटेन के उद्योगपतियों के दबाव में सरकार ने भारतीय कपड़ों पर Import Duty (आयात शुल्क) लगा दी, ताकि इंग्लैंड में केवल वहीं की बनी वस्तुएँ बिकें।

3. ईस्ट इंडिया कंपनी पर दबाव :- कंपनी पर यह दबाव डाला गया कि वह भारत में ब्रिटेन में बने कपड़ों की बिक्री को बढ़ाए।

4. भारत में विदेशी कपड़ों की बाढ़ :- अठारहवीं सदी के अंत तक भारत में ब्रिटेन के सूती कपड़े लगभग नहीं आते थे, पर 1850 तक कुल आयात में सूती कपड़ों का हिस्सा 31% हो गया और 1870 के दशक तक यह बढ़कर 50% से अधिक पहुँच गया।

5. भारतीय उद्योगों पर प्रभाव :- विदेशी मशीनों से बने सस्ते कपड़ों की वजह से भारतीय बुनकरों और कारीगरों की मांग घट गई और उनकी आजीविका संकट में पड़ गई।

उदाहरण :- 

मैनचेस्टर के कपड़े भारत के बाजारों में इतने सस्ते बिकने लगे कि बंगाल, गुजरात और मद्रास के पारंपरिक बुनकरों की रोज़ी-रोटी छिन गई।

प्रश्न :- मैनचेस्टर के आगमन से भारतीय बुनकरों के सामने कौन-कौन सी समस्याएँ आईं?

उत्तर :- उन्नीसवीं सदी में मैनचेस्टर के कपड़ों के भारत आने से भारतीय बुनकरों की स्थिति बहुत खराब हो गई। उनके सामने निम्नलिखित कठिनाइयाँ उत्पन्न हुईं :- 

1. नियति (विदेशी) बाजार का ढह जाना :- अब यूरोप और इंग्लैंड में भारतीय कपड़ों की मांग बहुत घट गई, जिससे विदेशी बाजार पूरी तरह टूट गया।

2. स्थानीय बाजार का संकुचित होना :- भारत के भीतर भी ब्रिटेन से आयातित सस्ते कपड़ों की बाढ़ आ गई, जिससे बुनकरों के उत्पाद बिकना बंद हो गए।

3. कपास की कमी :- ब्रिटिश उद्योगपतियों ने भारत से कच्ची कपास का भारी निर्यात शुरू कर दिया, जिसके कारण भारतीय बुनकरों को अच्छी गुणवत्ता की कपास नहीं मिल पाती थी।

4. ऊँची कीमत पर कपास खरीदने की मजबूरी :- कपास के निर्यात से उसकी कीमतें बढ़ गईं, इसलिए बुनकरों को ऊँची कीमत पर कपास खरीदनी पड़ती थी।

5. मशीनों से बनी वस्तुओं की प्रतिस्पर्धा :- उन्नीसवीं सदी के अंत तक भारत में फैक्ट्रियाँ स्थापित हो गईं और सस्ते मशीनी कपड़ों की बाढ़ आने से हाथ के बने कपड़ों की मांग और घट गई।

उदाहरण :- 

बंगाल और मद्रास के बुनकरों को ब्रिटिश कपड़ों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ी, जिससे उनकी पारंपरिक उद्योग-व्यवस्था पूरी तरह कमजोर हो गई।

प्रश्न :- भारत में कारखानों की शुरुआत कब और कहाँ हुई?

उत्तर :- भारत में औद्योगीकरण की शुरुआत 19वीं सदी के मध्य में हुई जब विभिन्न शहरों में सूती और जूट मिलों की स्थापना की गई।

भारत में कारखानों  के विषय में मुख्य तथ्य निम्नलिखित हैं :-

1. बम्बई (मुंबई) में पहला सूती कपड़ा मिल 1854 में स्थापित हुआ और 1856 में उत्पादन शुरू हुआ। यह भारत के आधुनिक औद्योगीकरण की शुरुआत मानी जाती है।

2. बंगाल में जूट मिलों की स्थापना लगभग उसी समय, 1850 के दशक में जूट मिलें खुलीं। बंगाल जूट उद्योग का प्रमुख केंद्र बन गया।

3. कानपुर में एल्गिन मिल 1860 के दशक में एल्गिन मिल की स्थापना हुई। यहाँ मुख्य रूप से ऊनी कपड़ा तैयार किया जाता था।

4. अहमदाबाद में सूती मिल इसी अवधि में अहमदाबाद में पहली सूती मिल शुरू हुई, जो आगे चलकर “भारत का मैनचेस्टर” कहलाया।

5. मद्रास (चेन्नई) में सूती मिल 1874 में पहली सूती मिल में उत्पादन आरंभ हुआ।

उदाहरण :-

1854 में बम्बई की “बॉम्बे स्पिनिंग एंड वीविंग कंपनी” भारत की पहली सफल सूती कपड़ा मिल थी।

प्रश्न :- भारत में प्रारंभिक उद्यमी कौन थे और उनका योगदान क्या था?

उत्तर :- भारत में औद्योगीकरण के प्रारंभिक दौर में कुछ भारतीय उद्यमियों ने उद्योग और व्यापार के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

भारत में प्रारंभिक उद्यमीयों  के विषय में मुख्य तथ्य निम्नलिखित हैं :-

1. द्वारकानाथ टैगोर (बंगाल) :- इन्होंने चीन के साथ व्यापार किया तथा 6 संयुक्त उद्यम कंपनियाँ (Joint Stock Companies) स्थापित कीं।

2. डिनशॉ पेटिट और जे. एन. टाटा (बम्बई) :- सूती वस्त्र उद्योग के प्रमुख उद्योगपति बने। टाटा ने आगे चलकर इस्पात उद्योग और आधुनिक उद्योगों की नींव रखी।

3. सेठ हुकुमचंद (कलकत्ता) :- भारत में पहली जूट मिल की स्थापना की। इन्हें “भारत के जूट राजा” के रूप में भी जाना जाता था।

4. जी. डी. बिड़ला :- इन्होंने वस्त्र उद्योग में निवेश किया और बाद में विविध उद्योगों में भी विस्तार किया।

5. दक्षिण भारत के व्यापारी (मद्रास) :- वर्मा, मध्य पूर्व और पूर्वी अफ्रीका के साथ व्यापार करते थे।

उदाहरण :-

बम्बई के जे. एन. टाटा ने 19वीं सदी में “टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (TISCO)” की स्थापना की, जो आगे चलकर भारत के सबसे बड़े औद्योगिक समूहों में से एक बनी।

नोट :-

1. अंग्रेजी एजेंसियों के नियंत्रण के कारण भारतीय व्यापारियों को बढ़ने के सीमित अवसर मिले।

2. प्रथम विश्व युद्ध तक अधिकांश उद्योग यूरोपीय एजेंसियों के अधीन थे।

प्रश्न :- भारत के कारखानों में मजदूर कहाँ से आते थे?

उत्तर :- भारत में औद्योगीकरण के प्रारंभिक दौर में अधिकांश मजदूर ग्रामीण क्षेत्रों और आसपास के जिलों से आए, जो खेती या कारीगरी से जुड़े थे लेकिन गाँवों में उन्हें पर्याप्त काम नहीं मिलता था।

भारत के कारखानों में मजदूर निम्नलिखित जगहों से आते थे :- 

1. आसपास के जिलों से मजदूरों का आगमन :- अधिकांश मजदूर उसी क्षेत्र या पास के जिलों से आते थे जहाँ कारखाने स्थापित हुए थे।

2. किसान और कारीगर वर्ग :- जो किसान खेती में जीविका नहीं चला पाते थे या जिन कारीगरों का पारंपरिक काम बंद हो गया था, वे कारखानों की ओर रोजगार के लिए गए।

3. स्थानीय प्रवासन :- यह मजदूर अस्थायी रूप से शहरों में काम करने आते थे और कृषि मौसम में गाँव लौट जाते थे।

उदाहरण :-

बंबई (मुंबई) की सूती कपड़ा मिलों में काम करने वाले अधिकांश मजदूर पास के रत्नागिरी जिले से आते थे।

प्रश्न :- 19वीं सदी में भारतीय मजदूरों की दशा कैसी थी?

उत्तर :- 19वीं सदी में भारतीय मजदूरों की स्थिति निम्नलिखित थी :-

1. मजदूरों की संख्या :- 1901 में भारतीय फैक्ट्रियों में लगभग 5,84,000 मजदूर काम करते थे। 1946 तक यह संख्या बढ़कर 24,36,000 हो गई।

2. अस्थायी रोजगार :- अधिकांश मजदूर केवल अस्थायी तौर पर रखे जाते थे। फसल की कटाई के समय मजदूर गाँव लौट जाते थे।

3. रोज़गार की कठिनाई :- नौकरी पाना मुश्किल था और स्थायी रोजगार दुर्लभ था।

4. कड़ी निगरानी :- जॉबर (Jobber) मजदूरों की पूरी तरह से जिंदगी और काम को नियंत्रित करते थे।

उदाहरण :-

बंबई की सूती मिलों में मजदूरों को केवल कुछ महीनों के लिए रखा जाता था और फसल कटाई के समय वे गाँव लौट जाते थे।

नोट :-

19वीं सदी में भारतीय मजदूरों की स्थिति बहुत कठिन और अस्थिर थी।

प्रश्न :- जॉबर कौन थे और उनका कार्य क्या था?

उत्तर :- जॉबर :-  वे कर्मचारी होते थे। जॉबर आमतौर पर कोई पुराना और विश्वस्त कर्मचारी होता था। जिन्हें उद्योगपतियों ने मजदूरों की भर्ती और प्रबंधन के लिए रखा था।

जॉबर निम्नलिखित कार्यों के लिए जिम्मेदार होते थे :- 

1. नियुक्ति :- उद्योगपतियों द्वारा मजदूरों की भर्ती के लिए नियुक्त किया जाता था।

2. मजदूरों की व्यवस्था :- गाँव से मजदूरों को शहर लाना। मजदूरों को काम का भरोसा दिलाना और शहर में बसने में मदद करना।

उदाहरण :-
बंबई की सूती मिलों में जॉबर गाँव के कामगारों को मिलों तक लाते और काम का भरोसा देते थे, लेकिन बाद में वे मजदूरों से अतिरिक्त शुल्क या उपहार लेने लगे।

नोट :-

जॉबर स्वार्थी होते थे वे मजदूरों से मदद के बदले पैसे या तोहफे लेते थे।

प्रश्न :- भारत में औद्योगिक विकास का अनूठापन क्या था और 19वीं-20वीं सदी में क्या बदलाव आए?

उत्तर :- भारत में औद्योगिक विकास की विशेषता निम्नलिखित थी :- 

1. यूरोपीय एजेंसियों का नियंत्रण :- भारत में औद्योगिक उत्पादन पर यूरोपीय प्रबंधकीय एजेंसियों का वर्चस्व था। यहाँ उद्योग मुख्य रूप से यूरोपीय एजेंसियों की पसंद और बाजार के अनुसार विकसित हुए। उनका मुख्य ध्यान उन वस्तुओं पर था जिन्हें निर्यात किया जा सके, जैसे चाय, कॉफी, नील, जूट और खनन उत्पाद

2. स्वदेशी व्यवसायियों की रणनीति :- भारतीय व्यवसायियों ने ऐसे उद्योग लगाए जो मैनचेस्टर उत्पादों से प्रतिस्पर्धा नहीं करते थेउदाहरण :-  धागे का उत्पादन, क्योंकि धागा आयात नहीं किया जाता था।

19वीं-20वीं सदी में निम्नलिखित बदलाव आए :- 

1. स्वदेशी आंदोलन का प्रभाव :- 20वीं सदी के पहले दशक में स्वदेशी आंदोलन ने लोगों को विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के लिए प्रेरित किया। इससे भारत में कपड़ा उत्पादन बढ़ा।

2. बाजार की जरूरत :- चीन को धागे का निर्यात घटने के कारण भी धागा उत्पादक कपड़ा उत्पादन में लगे।

3. औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि :- 1900-1912 के बीच सूती कपड़े का उत्पादन दुगुना हो गया। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान नई फैक्ट्रियों की स्थापना हुई क्योंकि ब्रिटिश युद्ध के लिए उत्पादन में व्यस्त थे।

उदाहरण :-

19वीं सदी के अंत में भारत में धागे की मिलों की स्थापना हुई, और 20वीं सदी के शुरुआत में स्वदेशी आंदोलन और युद्ध के कारण कपड़ा उद्योग में तेजी आई।

प्रश्न :- 19वीं और 20वीं सदी में भारत में लघु उद्योगों की स्थिति कैसी थी?

उत्तर :- भारत में औद्योगिक वृद्धि के बावजूद लघु उद्योगों का प्रभुत्व बना रहा। बड़े औद्योगिक संस्थानों का हिस्सा सीमित था और अधिकांश कामगार छोटे उद्योगों में ही कार्यरत थे।

19वीं और 20वीं सदी में भारत में लघु उद्योगों की निम्नलिखित स्थिति थी :- 

1. बड़े उद्योगों का सीमित हिस्सा :- लगभग 67% बड़े उद्योग केवल बंगाल और बम्बई में स्थित थे। देश के अन्य हिस्सों में लघु उद्योग प्रमुख थे।

2. कामगारों की संख्या :- रजिस्टर्ड कंपनियों में काम करने वाले मजदूर बहुत कम थे। 1911 में यह 5% और 1931 में 10% था।

3. हथकरघा उद्योग में सुधार :- 20वीं सदी में हाथ से बनने वाले उत्पादों में वृद्धि हुई। बुनकरों ने अपने करघों में फ्लाई शटल का उपयोग शुरू किया।

4. फ्लाई शटल का प्रसार :- 1941 तक भारत के 35% से अधिक हथकरघों में फ्लाई शटल लग चुका था। त्रावणकोर, मद्रास, मैसूर, कोचिन और बंगाल जैसे क्षेत्रों में 70-80% हथकरघों में फ्लाई शटल इस्तेमाल हो रहा था।

5. उत्पादन क्षमता में वृद्धि :- नई तकनीकी सुधारों और फ्लाई शटल के इस्तेमाल से हथकरघा उद्योग की उत्पादन क्षमता बढ़ गई।

उदाहरण :-

बंगाल के हथकरघा उद्योग में 1940 के दशक तक फ्लाई शटल लगने के कारण उत्पादन मात्रा और गुणवत्ता दोनों में सुधार हुआ।

प्रश्न :- फ्लाई शटल क्या है?

उत्तर :- फ्लाई शटल :- एक यांत्रिक औजार है जिसका उपयोग बुनाई (टेक्सटाइल) में किया जाता है।

फ्लाई शटल की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :- 

1. कार्यप्रणाली :- यह रस्सी और पुलियों के जरिए चलता है।

2. उद्देश्य :- बुनाई की गति और उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

3. औद्योगिक महत्व :- हथकरघा उद्योग में फ्लाई शटल के उपयोग से उत्पादन तेजी से बढ़ा और गुणवत्ता सुधरी।

उदाहरण :-

त्रावणकोर और बंगाल के हथकरघा उद्योग में बुनकरों ने अपने करघों में फ्लाई शटल लगाकर उत्पादन क्षमता बढ़ाई।

प्रश्न :- 19वीं सदी में उत्पादक, वस्तुओं के लिए बाजार में ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए कौन-कौन से तरीके अपनाते थे?

उत्तर :- 19वीं सदी में उत्पादक ग्राहकों को आकर्षित करने और अपने उत्पादों को लोकप्रिय बनाने के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाते थे।

1. विज्ञापन का प्रयोग :- उत्पादक अपने उत्पादों पर लेबल लगाते थे। मैनचेस्टर के उत्पादक अपने लेबल पर उत्पादन का स्थान दिखाते थे। ‘Made in Manchester’ का लेबल गुणवत्ता का प्रतीक माना जाता था।

2. लेबल पर चित्र :- लेबल पर सुंदर चित्र होते थे, अक्सर भारतीय देवी-देवताओं की तस्वीर। इससे स्थानीय लोगों से संबंध बनाने में मदद मिलती थी।

3. कैलेंडर वितरण :- 19वीं सदी के उत्तरार्ध में उत्पादक अपने उत्पादों को प्रसिद्ध बनाने के लिए कैलेंडर बाँटने लगे। कैलेंडर की शेल्फ लाइफ लंबी होती थी और यह पूरे साल ब्रांड रिमाइंडर का काम करता था।

4. राष्ट्रवादी संदेश :- भारतीय उत्पादक अपने विज्ञापनों में राष्ट्रवादी संदेश प्रमुखता से देते थे। इससे वे अपने ग्राहकों से सीधे तौर पर भावनात्मक जुड़ाव बनाए रखते थे।

उदाहरण :-

मैनचेस्टर के कपड़ों पर ‘Made in Manchester’ के लेबल और देवी-देवताओं की तस्वीरें देखकर भारतीय ग्राहक विश्वास और आकर्षण महसूस करते थे।

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