Class 10 history Notes in hindI Chapter - 3
Chapter 3: The Making of a Global World
Chapter Introduction:
This chapter explains how the world became interconnected through trade, migration, and cultural exchange. It highlights the impact of globalization on different regions and societies. The notes help students understand global historical processes clearly.
FAQ
Ques. Does this chapter help in understanding modern globalization?
Ans. Yes, this chapter builds the foundation for understanding present-day globalization.
CLASS 10 HISTORY NOTES IN HINDI
CHAPTER 3 : भूमंडलीकृत विश्व का बनना
प्रश्न :- वैश्वीकरण क्या है?
उत्तर :- वैश्वीकरण :- एक ऐसी आर्थिक प्रणाली है जिसमें व्यक्तियों, वस्तुओं और नौकरियों का एक देश से दूसरे देश तक स्थानांतरण होता है। यह देशों के बीच आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जुड़ाव को दर्शाता है।
वैश्वीकरण के विषय में मुख्य तथ्य निम्नलिखित हैं :-
1. वैश्वीकरण से विश्व के देशों के बीच आपसी निर्भरता बढ़ती है।
2. व्यापार, निवेश और संचार के माध्यम से विश्व एक-दूसरे से जुड़ गया है।
3. यह रोजगार, तकनीक और पूंजी के आदान–प्रदान को प्रोत्साहित करता है।
4. वैश्विक दुनिया के निर्माण को समझने के लिए व्यापार, प्रवासन, श्रमिकों की खोज और पूंजी के प्रवाह का अध्ययन आवश्यक है।
उदाहरण :-
जब भारत में विदेशी कंपनियाँ जैसे — एप्पल, माइक्रोसॉफ्ट या टोयोटा अपने उत्पाद बनाती या बेचती हैं, तो यह वैश्वीकरण का उदाहरण है।
प्रश्न :- भूमंडलीकरण क्या है?
उत्तर :- भूमंडलीकरण :- वह प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत दुनिया के विभिन्न देशों की आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक प्रणालियाँ एक-दूसरे से जुड़कर एक वैश्विक व्यवस्था का निर्माण करती हैं।
भूमंडलीकरण के विषय में मुख्य तथ्य निम्नलिखित हैं :-
1. इसमें वस्तुओं, सेवाओं, पूंजी और श्रम का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आदान–प्रदान होता है।
2. देशों के बीच सूचना, तकनीक और अनुसंधान के परिणामों का तीव्र प्रवाह होता है।
3. यह विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्थाओं को परस्पर निर्भर बना देता है।
4. भूमंडलीकरण से विश्व एक “वैश्विक गाँव” के रूप में दिखाई देने लगा है।
उदाहरण :-
जब भारत में अमेरिकी सॉफ्टवेयर, जापानी कारें और कोरियाई मोबाइल उपलब्ध होते हैं, तो यह भूमंडलीकरण का परिणाम होता है।
प्रश्न :- राष्ट्रवाद को जन्म देने वाले प्रमुख कारक कौन-कौन से थे?
उत्तर :- राष्ट्रवाद को जन्म देने वाले कारक :- विभिन्न देशों में भिन्न थे। यूरोप में यह राष्ट्र राज्यों के निर्माण से जुड़ा था, जबकि भारत और वियतनाम जैसे देशों में यह विदेशी शासन के विरोध से संबंधित था।
राष्ट्रवाद को जन्म देने वाले प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं :-
1. यूरोप में – राष्ट्रवाद का उदय राष्ट्र राज्यों के गठन और एकीकरण से जुड़ा हुआ था।
2. भारत, वियतनाम जैसे उपनिवेशों में – राष्ट्रवाद का संबंध उपनिवेशवाद के विरोध और स्वतंत्रता आंदोलन से था।
उदाहरण :-
भारत में ब्रिटिश शासन के विरोध से राष्ट्रीय आंदोलन प्रारंभ हुआ, जबकि यूरोप में फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों में राष्ट्रवाद ने एकीकृत राष्ट्र राज्य के निर्माण को प्रेरित किया।
प्रश्न :- वैश्वीकरण और भूमंडलीकरण में क्या अंतर है?
उत्तर :- वैश्वीकरण और भूमंडलीकरण में निम्नलिखित अंतर हैं :-
निष्कर्ष :-
वैश्वीकरण जहाँ आर्थिक जुड़ाव को दर्शाता है, वहीं भूमंडलीकरण पूरे विश्व के सामाजिक और सांस्कृतिक एकीकरण का प्रतीक है।
क्रम संख्या | आधार | वैश्वीकरण | भूमंडलीकरण |
1. | परिभाषा | वस्तुओं, सेवाओं, पूंजी, तकनीक और श्रम के अंतरराष्ट्रीय आदान–प्रदान की प्रक्रिया को वैश्वीकरण कहते हैं। | दुनिया की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और धार्मिक प्रणालियों के एकीकरण को भूमंडलीकरण कहते हैं। |
2. | स्वरूप | यह मुख्यतः एक आर्थिक प्रक्रिया है। | यह एक व्यापक सामाजिक प्रक्रिया है। |
3. | उद्देश्य | विश्व को एक आर्थिक बाजार बनाना। | पूरे विश्व को एक एकीकृत इकाई के रूप में जोड़ना। |
4. | प्रभाव क्षेत्र | व्यापार और अर्थव्यवस्था तक सीमित। | संस्कृति, समाज, राजनीति और अर्थव्यवस्था सभी को शामिल करता है। |
5. | उदाहरण | भारत में विदेशी कंपनियों का निवेश। | सोशल मीडिया से विश्व संस्कृति का फैलाव। |
वैश्वीकरण जहाँ आर्थिक जुड़ाव को दर्शाता है, वहीं भूमंडलीकरण पूरे विश्व के सामाजिक और सांस्कृतिक एकीकरण का प्रतीक है।
प्रश्न :- प्राचीन काल में वैश्विक संपर्क कैसे स्थापित हुआ?
उत्तर :- प्राचीन काल में यात्राओं, व्यापार और सांस्कृतिक आदान–प्रदान के माध्यम से विश्व के विभिन्न भागों के बीच संपर्क स्थापित हुआ।
प्राचीन काल के वैश्विक संपर्क से संबंधित प्रमुख तथ्य निम्नलिखित हैं :-
1. यात्री, व्यापारी, पुजारी और तीर्थयात्री ज्ञान, अवसर, आध्यात्मिक पूर्ति और उत्पीड़न से मुक्ति के लिए दूर-दूर तक यात्रा करते थे।
2. वे अपने साथ सामान, धन, कौशल, विचार, आविष्कार और बीमारियाँ तक ले जाते थे।
3. 3000 ईसा पूर्व में सिंधु घाटी सभ्यता का तटीय व्यापार पश्चिम एशिया से जुड़ा हुआ था।
4. रेशम मार्ग के माध्यम से चीन का पश्चिमी देशों से संपर्क स्थापित हुआ।
5. भोजन और फसलों का आदान-प्रदान भी हुआ — जैसे नूडल्स चीन से इटली पहुँचा और वहाँ स्पेगेटी कहलाया।
6. यूरोपीय विजेताओं ने जब अमेरिका में चेचक के रोगाणु ले जाए, तो यह बीमारी वहाँ तेजी से फैल गई।
उदाहरण :-
रेशम मार्ग के माध्यम से चीन का रेशम रोमन साम्राज्य तक पहुँचा, जिससे व्यापार और सांस्कृतिक संबंध दोनों मजबूत हुए।
प्रश्न :- रेशम मार्ग (सिल्क रूट) क्या था?
उत्तर :- रेशम मार्ग (सिल्क रूट) :- एक ऐतिहासिक व्यापारिक मार्ग था जो एशिया, यूरोप और उत्तरी अफ्रीका को जोड़ता था। इस मार्ग का उपयोग वस्तुओं, विचारों, संस्कृतियों और धर्मों के आदान–प्रदान के लिए किया जाता था।
रेशम मार्ग के बारे में प्रमुख तथ्य निम्नलिखित हैं :-
1. रेशम मार्ग दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर 14वीं शताब्दी तक सक्रिय रहा।
2. यह चीन, भारत, फारस, अरब, ग्रीस और इटली को आपस में जोड़ता था।
3. इस मार्ग से मुख्य रूप से रेशम का व्यापार होता था, इसलिए इसे “सिल्क रूट” कहा गया।
4. यह केवल स्थल मार्ग नहीं था, बल्कि समुद्री मार्गों को भी शामिल करता था।
5. इस मार्ग ने सभ्यताओं के बीच सांस्कृतिक और आर्थिक संबंधों को मजबूत किया।
उदाहरण :-
चीन से रेशम यूरोप तक इसी मार्ग से पहुँचता था, जबकि भारत से मसाले और कीमती पत्थर पश्चिमी देशों में भेजे जाते थे।
प्रश्न :- रेशम मार्ग (सिल्क रूट) की विशेषताएँ क्या थीं?
उत्तर :- रेशम मार्ग एक प्रमुख व्यापारिक और सांस्कृतिक मार्ग था, जिसने विभिन्न देशों और सभ्यताओं को एक-दूसरे से जोड़ा।
रेशम मार्ग की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-
1. इस सिल्क रूट से होकर चीन के बर्तन अन्य देशों तक पहुँचते थे।
2. यूरोप से सोना और चाँदी इसी मार्ग के माध्यम से एशिया में लाए जाते थे।
3. ईसाई, इस्लाम और बौद्ध धर्म जैसे प्रमुख धर्म इसी मार्ग से दुनिया के विभिन्न भागों में फैले।
4. रेशम मार्ग को दूरस्थ क्षेत्रों को जोड़ने वाला सबसे महत्वपूर्ण मार्ग माना जाता था।
5. यह मार्ग क्रिश्चियन युग से पहले भी अस्तित्व में था और 15वीं शताब्दी तक विकसित होता रहा।
6. यह मार्ग व्यापार और सांस्कृतिक संबंधों का प्रमुख माध्यम था, जिसने सभ्यताओं के बीच संपर्क बढ़ाया।
उदाहरण :- चीन का रेशम, भारत के मसाले और अरब का सोना इसी मार्ग से यूरोप के बाज़ारों तक पहुँचते थे।
प्रश्न :- भोजन की यात्रा (स्पैघेत्ती और आलू) क्या थी?
उत्तर :- भोजन की यात्रा :- भोजन की यात्रा का अर्थ है खाद्य पदार्थों का एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप में पहुँचना, जिससे लोगों के खान-पान और कृषि पर प्रभाव पड़ा।
भोजन की यात्रा के प्रमुख तथ्य निम्नलिखित हैं :-
1. स्पैघेत्ती :- स्पैघेत्ती की उत्पत्ति चीन के नूडल से हुई और धीरे-धीरे यह दुनिया के अन्य हिस्सों में पहुँचा। इसका इटैलियन रूप स्पैघेत्ती कहलाया, जिसे आज पूरी दुनिया में खाया जाता है।
2. आलू :- आलू अमेरिका से यूरोप पहुँचा और यूरोप के लोगों की जीवनशैली और खाने की आदतों में बदलाव लाया। मिर्च, टमाटर, मक्का, सोया, मूंगफली और शकरकंद भी अमेरिका से यूरोप पहुँचे। आयरलैंड में आलू पर निर्भरता अधिक होने के कारण 1840 के दशक में आलू की फसल खराब होने पर लाखों लोग भूख से मरे, जिसे आयरिश अकाल कहा गया। उदाहरण :- चीन से नूडल यूरोप पहुँचा और वहां स्पैघेत्ती बन गया, जबकि अमेरिका से आलू और मिर्च यूरोप पहुँचे और यूरोपीय जीवनशैली पर बड़ा प्रभाव पड़ा।
प्रश्न :- विजय, बीमारी और व्यापार के माध्यम से यूरोप ने अमेरिका और विश्व में प्रभाव कैसे बनाया?
उत्तर :- यूरोप ने अमेरिका और विश्व में विजय और व्यापार के माध्यम से अपना प्रभाव निम्नलिखित तरीके से बढ़ाया :-
1. सोलहवीं सदी में यूरोपीय नाविकों ने एशिया और अमेरिका तक नए समुद्री मार्ग खोजे, जिससे व्यापार और विजय दोनों संभव हुए।
2. अमेरिका में खनिजों और अनाज का बड़ा भंडार था, जिसने विश्व के अन्य भागों के लोगों का जीवन बदल दिया।
3. यूरोपियों ने अमेरिका में चेचक के जीवाणु अपने साथ ले जाकर स्थानीय लोगों को बीमार किया, जिससे आसानी से विजय प्राप्त हुई।
4. यूरोप में गरीबी, बीमारी और धार्मिक टकराव के कारण कई लोग अमेरिका गए और वहां अवसरों का लाभ उठाया।
5. अठारहवीं सदी तक भारत और चीन दुनिया के सबसे धनी देश थे, लेकिन चीन ने बाहरी संपर्क घटा दिया, जिससे विश्व व्यापार का केंद्र यूरोप की ओर शिफ्ट हुआ। उदाहरण :- पुर्तगाल और स्पेन के नाविक अमेरिका पहुँचे और वहां चेचक के कारण स्थानीय आबादी कमजोर होने पर आसानी से नियंत्रण स्थापित कर दिया। अमेरिका के अनाज और खनिज यूरोप में आर्थिक वृद्धि का कारण बने।
प्रश्न :- उन्नीसवीं सदी में आर्थिक आदान–प्रदान के प्रकार क्या थे?
उत्तर :- उन्नीसवीं सदी में दुनिया में तेजी से बदलाव हो रहे थे और विभिन्न देशों के बीच आर्थिक आदान–प्रदान के निम्नलिखित प्रकार थे :-
1. वस्तुओं का प्रवाह :- व्यापार मुख्य रूप से वस्तुओं जैसे कपड़ा, गेहूं आदि के माध्यम से होता था।
2. श्रम का प्रवाह :- लोग काम या रोजगार की तलाश में एक जगह से दूसरी जगह जाते थे।
3. पूंजी का प्रवाह :- अल्प या दीर्घ अवधि के लिए दूर-दराज के क्षेत्रों में निवेश किया जाता था।
उदाहरण :-
यूरोपियन निवेशकों ने भारत और अफ्रीका में रेलवे और उद्योग स्थापित किए, जबकि मजदूरों का प्रवास अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में काम करने के लिए हुआ।
प्रश्न :- विश्व अर्थव्यवस्था का उदय कैसे हुआ?
उत्तर :- 18वीं सदी के अंत तक ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था में बड़े बदलाव हुए, जिसने वैश्विक अर्थव्यवस्था के उदय की नींव रखी।
विश्व अर्थव्यवस्था का उदय के मुख्य कारक निम्नलिखित है :-
1. जनसंख्या वृद्धि :- कुछ समय बाद जनसंख्या में अचानक वृद्धि हुई, जिससे भोजन की मांग बढ़ गई।
2. आवश्यक सुधार :- बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए कृषि आधारित सामान की मात्रा में वृद्धि की जरूरत थी।
3. कॉर्न लॉ का समाप्ति :- सरकार ने कॉर्न लॉ को समाप्त कर दिया, जिससे विभिन्न देशों के व्यापारी ब्रिटेन में भोजन निर्यात करने लगे।
4. विकास और वैश्विक व्यापार :- भोजन की आपूर्ति में सुधार और निर्यात से आर्थिक विकास शुरू हुआ और वैश्विक अर्थव्यवस्था का उदय हुआ।
उदाहरण :-
ब्रिटेन में अनाज और अन्य कृषि उत्पादों के निर्यात से यूरोप और उपनिवेशों में व्यापार बढ़ा और अन्य देशों को भी आर्थिक लाभ मिला।
नोट :-
कॉर्न लॉ – ब्रिटेन में कॉर्न लॉ लागू था, जिसके तहत मक्का के आयात पर पाबंदी थी।
प्रश्न :- कॉर्न लॉ के समय और उसके हटाने के बाद क्या बदलाव हुए?
उत्तर :- कॉर्न लॉ के समय और उसके हटाने के बाद प्रमुख बदलाव निम्नलिखित थे :-
कॉर्न लॉ के समय | कॉर्न लॉ हटाने के बाद |
1. भोजन की मांग बढ़ी। | 1. व्यापार में वृद्धि हुई। |
2. जनसंख्या में वृद्धि हुई। | 2. विकास की गति तेज हुई। |
3. भोजन के दाम बढ़ गए। | 3. भोजन का अधिक भंडार होने लगा। |
उदाहरण :-
कॉर्न लॉ हटने के बाद ब्रिटेन में विदेशों से अनाज का आयात बढ़ा और आम जनता के लिए पर्याप्त भोजन उपलब्ध होने लगा।
प्रश्न :- विश्व की अर्थव्यवस्था के भूमंडलीकरण में तकनीक का योगदान क्या था?
उत्तर :- विश्व की अर्थव्यवस्था के भूमंडलीकरण में तकनीक ने निम्नलिखित महत्वपूर्ण भूमिका निभाई :-
1. रेलवे ने आंतरिक भूभागों और बंदरगाहों को आपस में जोड़ दिया।
2. स्टीम शिप के कारण भारी मात्रा में माल को अतलांतिक के पार ले जाना आसान हो गया।
3. टेलीग्राफ की मदद से संचार व्यवस्था में तेजी आई और आर्थिक लेन-देन बेहतर ढंग से होने लगे।
उदाहरण :-
ब्रिटेन और अमेरिका के बीच व्यापार में रेलवे और स्टीम शिप की मदद से वस्तुएँ तेज़ी से पहुंचने लगीं और टेलीग्राफ ने व्यापारियों को तुरंत सूचनाएँ देने में मदद की।
प्रश्न :- उन्नीसवीं सदी के आखिर में उपनिवेशवाद का क्या प्रभाव था?
उत्तर :- उन्नीसवीं सदी के आखिर में उपनिवेशवाद ने विश्व में निम्नलिखित राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव छोड़ा :-
1. यूरोप में व्यापार के विस्तार और आर्थिक लाभ के कारण लोगों की जीवनशैली बेहतर हुई।
2. उपनिवेशों में स्थानीय लोगों के जीवन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा।
3. अफ्रीका के अधिकांश देशों की सीमाएँ सीधी रेखाओं में बनाई गईं, जो प्राकृतिक या सांस्कृतिक सीमा के आधार पर नहीं थीं।
4. 1885 में यूरोप की शक्तियों ने बर्लिन सम्मेलन में मिलकर अफ्रीका को बाँट लिया।
उदाहरण :-
अफ्रीका के देशों की सीमाएँ इस तरह निर्धारित हुईं कि कभी-कभी एक ही जनजाति के लोग कई देशों में बंट गए और प्रशासन में समस्याएँ पैदा हुईं।
प्रश्न :- रिंडरपेस्ट या मवेशी प्लेग क्या थी और इसका अफ्रीका पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर :- रिंडरपेस्ट (मवेशी प्लेग) :- एक ऐसी बीमारी थी जो मवेशियों में तेजी से फैलती थी और अफ्रीका में 1890 के दशक में बड़े पैमाने पर देखी गई। रिंडरपेस्ट अफ्रीका में 1880 के दशक के अंत में ब्रिटिश एशिया से लाए गए घोड़ों के साथ आई।
इसका अफ्रीका पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ा :-
1. यह बीमारी तेजी से पूरे महाद्वीप में फैल गई और 1892 तक पश्चिमी अफ्रीका तक पहुँच गई।
2. रिंडरपेस्ट ने अफ्रीका के मवेशियों की आबादी का लगभग 90% हिस्सा नष्ट कर दिया।
3. मवेशियों के नुकसान से अफ्रीकियों की रोज़ी-रोटी पर गंभीर संकट आया और उन्हें खेतों और बागानों में काम करना पड़ा।
4. इस स्थिति ने यूरोपियन को अफ्रीका में उपनिवेश स्थापित करने में आसानी प्रदान की।
उदाहरण :-
मवेशियों की बड़ी मौत के कारण अफ्रीका में किसानों और चरवाहों की आर्थिक स्थिति प्रभावित हुई और यूरोपियन व्यापारियों तथा उपनिवेशवादियों को क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित करने में मदद मिली।
प्रश्न :- बंधुआ मजदूर कौन थे और उनकी स्थिति कैसी थी?
उत्तर :- बंधुआ मजदूर :- वे लोग थे जिन्हें निश्चित समय के लिए किसी मालिक के अधीन काम करने को बाध्य किया जाता था। इनकी स्थिति बहुत कठिन थी।
बंधुआ मजदूर के विषय में महत्वपूर्ण तथ्य निम्नलिखित है :-
1. बंधुआ मजदूर वे होते थे जो किसी निश्चित मालिक के लिए निश्चित समय तक काम करने को बाध्य होते थे।
2. अधिकांश मजदूर बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य भारत और तमिलनाडु के सूखाग्रस्त क्षेत्रों से लिए गए।
3. इन्हें कैरेबियन द्वीप, मॉरिशस, फिजी, सीलोन (श्रीलंका) और मलाया (मलेशिया) जैसे स्थानों पर भेजा गया।
4. भारत में कई बंधुआ मजदूरों को असम के चाय बागानों में काम पर लगाया गया।
5. एजेंट इन मजदूरों को झूठे वादे करके ले जाते थे और वहाँ उन्हें बहुत कठिन परिस्थितियों में काम करना पड़ता था।
6. 1900 के दशक में राष्ट्रवादियों ने इस प्रथा का विरोध शुरू किया और 1921 में यह व्यवस्था समाप्त कर दी गई। उदाहरण :- भारत के कई मजदूर झूठे वादों के कारण फिजी और मॉरिशस भेजे गए, जहाँ उन्हें वर्षों तक कठोर परिस्थितियों में बिना अधिकारों के काम करना पड़ा।
प्रश्न :- भारतीय व्यापार, उपनिवेश और वैश्विक व्यवस्था का आपस में क्या संबंध था?
उत्तर :- उन्नीसवीं सदी में भारत का व्यापार ब्रिटिश उपनिवेशवाद के नियंत्रण में आ गया, जिससे भारत की अर्थव्यवस्था ब्रिटेन के हित में काम करने लगी।
भारतीय व्यापार, उपनिवेश और वैश्विक व्यवस्था के आपस में निम्नलिखित संबंध थे :-
1. भारत से उत्तम कॉटन के कपड़े पहले यूरोप निर्यात होते थे।
2. औद्योगिकीकरण (Industrialization) के बाद ब्रिटिश उत्पादकों ने भारत से आने वाले कपड़ों पर प्रतिबंध लगवा दिया।
3. इसके परिणामस्वरूप ब्रिटेन में बने कपड़े भारत के बाजारों में बड़ी मात्रा में आने लगे।
4. 1800 में भारत के निर्यात का 30% हिस्सा कॉटन कपड़ों का था, जो 1815 में घटकर 15%, और 1870 में केवल 3% रह गया।
5. वहीं 1812 से 1871 तक कच्चे कपास का निर्यात 5% से बढ़कर 35% हो गया।
6. इस दौरान नील (Indigo) और अफीम (Opium) का निर्यात भी तेज़ी से बढ़ा। अफीम मुख्यतः चीन भेजी जाती थी।
7. भारत से कच्चा माल और अनाज ब्रिटेन को निर्यात किया जाने लगा, जबकि ब्रिटेन से तैयार माल भारत में आयात होने लगा।
8. इससे व्यापार का संतुलन (Trade Surplus) ब्रिटेन के पक्ष में चला गया।
9. भारत की आमदनी से ब्रिटेन ने अपने अन्य उपनिवेशों की देखरेख और ‘होम चार्ज’ (Home Charges) जैसे खर्चों का भुगतान किया।
10. होम चार्ज में ब्रिटिश अधिकारियों की पेंशन, कर्ज़ की भरपाई, और भारत में तैनात अधिकारियों के वेतन शामिल थे। उदाहरण :- भारत से कपास और नील ब्रिटेन को भेजी जाती थी, वहीं ब्रिटेन से मशीन से बने कपड़े भारत में बेचे जाते थे। इस प्रकार भारत कच्चा माल देने वाला और ब्रिटेन तैयार माल बेचने वाला देश बन गया।
प्रश्न :- प्रथम विश्व युद्ध किसके बीच लड़ा गया और इसका प्रभाव क्या था?
उत्तर :- प्रथम विश्व युद्ध मुख्य रूप से यूरोप में लड़ा गया था और इसने पूरी दुनिया की राजनीति व अर्थव्यवस्था को निम्नलिखित तरीके से प्रभावित किया :-
1. यह युद्ध 1914 से 1918 तक चला।
2. यह युद्ध दो गुटों के बीच लड़ा गया –
(i) मित्र राष्ट्र (Allied Powers) – ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, और बाद में अमेरिका।
(ii) केन्द्रीय शक्तियाँ (Central Powers) – जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी, ओटोमन साम्राज्य और तुर्की।
3. इस युद्ध से आर्थिक और राजनीतिक अस्थिरता बढ़ गई।
4. कई देशों की अर्थव्यवस्था कमजोर हो गई और लोगों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
उदाहरण :-
प्रथम विश्व युद्ध के बाद जर्मनी पर भारी युद्ध क्षतिपूर्ति लगाई गई, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह टूट गई।
प्रश्न :- प्रथम विश्व युद्ध के समय हुए युद्धकालीन रूपांतरण क्या थे?
उत्तर :- प्रथम विश्व युद्ध ने विश्व की अर्थव्यवस्था, समाज और श्रम व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया :-
1. इस युद्ध में लगभग 90 लाख लोग मारे गए और 2 करोड़ घायल हुए।
2. मरने वाले अधिकतर युवा कामकाजी लोग थे, जिससे कामगारों की भारी कमी हो गई।
3. परिवारों में कमाने वालों की संख्या घटने से लोगों की आय कम हो गई।
4. पुरुषों के युद्ध में जाने के कारण महिलाओं ने कारखानों में काम करना शुरू किया।
5. युद्ध ने आर्थिक शक्तियों के संबंधों को तोड़ दिया, जिससे विश्व व्यापार प्रभावित हुआ।
6. ब्रिटेन ने अमेरिका से कर्ज लिया, जिसके परिणामस्वरूप अमेरिका एक अंतरराष्ट्रीय साहूकार के रूप में उभरा।
उदाहरण :-
प्रथम विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था कमजोर हो गई, जबकि अमेरिका की आर्थिक स्थिति मजबूत होकर वह विश्व की नई शक्ति बन गया।
प्रश्न :- प्रथम विश्व युद्ध के बाद हुए युद्धोत्तर सुधारों का क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर :- प्रथम विश्व युद्ध के बाद हुए युद्धोत्तर सुधारों से विश्व की अर्थव्यवस्था और व्यापार में निम्नलिखित बड़े बदलाव आए :-
1. जापान और भारत में उद्योगों का विकास हुआ क्योंकि युद्ध के समय ब्रिटेन अपने उद्योगों पर ध्यान नहीं दे सका।
2. युद्ध के बाद ब्रिटेन की आर्थिक शक्ति घट गई और वह अमेरिका पर निर्भर हो गया।
3. ब्रिटेन पर अमेरिकी कर्ज का बोझ बढ़ गया जिससे उसकी अंतरराष्ट्रीय स्थिति कमजोर हुई।
4. युद्ध के दौरान चीजों की मांग बढ़ी, लेकिन युद्ध खत्म होने पर मांग घट गई और 20% कामगार बेरोजगार हो गए।
5. युद्ध के पहले पूर्वी यूरोप गेहूँ का मुख्य निर्यातक था, पर युद्ध के दौरान कनाडा, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया इसकी जगह ले चुके थे।
6. युद्ध के बाद जब पूर्वी यूरोप ने फिर से गेहूँ की आपूर्ति शुरू की, तो बाजार में गेहूँ की अधिकता से कीमतें गिर गईं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नुकसान हुआ।
उदाहरण :-
युद्ध के बाद ब्रिटेन की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर हो गई कि उसे अमेरिका से कर्ज लेकर अपनी जरूरतें पूरी करनी पड़ीं, जबकि अमेरिका और जापान नई औद्योगिक शक्तियाँ बनकर उभरे।
प्रश्न :- प्रथम विश्व युद्ध के बाद अमेरिकी अर्थव्यवस्था में बड़े पैमाने पर उत्पादन और उपभोग की शुरुआत कैसे हुई?
उत्तर :- प्रथम विश्व युद्ध के बाद अमेरिकी अर्थव्यवस्था तेजी से उभरने लगी और 1920 के दशक में बड़े पैमाने पर उत्पादन उसकी सबसे बड़ी विशेषता बन गया।
1. हेनरी फोर्ड ने बड़े पैमाने पर उत्पादन (Mass Production) की शुरुआत की, जिससे उत्पादन क्षमता बढ़ी और कीमतें घट गईं।
2. अमेरिका के कामगारों की आमदनी बढ़ी, जिससे उनके पास अधिक खर्च करने की क्षमता आई।
3. उत्पादों की माँग में वृद्धि हुई — विशेषकर कार, रेडियो, रेफ्रिजरेटर, वाशिंग मशीन जैसे उपभोक्ता सामानों की।
4. कारों का उत्पादन 1919 में 20 लाख से बढ़कर 1929 में 50 लाख हो गया।
5. आसान किस्तों पर कर्ज मिलने से लोगों ने ज्यादा सामान खरीदे और उपभोग में वृद्धि हुई।
6. अमेरिकी अर्थव्यवस्था खुशहाल हो गई और 1923 के बाद अमेरिका सबसे बड़ा विदेशी साहूकार बन गया।
7. इससे यूरोप की अर्थव्यवस्था सुधरी और विश्व व्यापार में लगभग छह वर्षों तक तेजी बनी रही।
उदाहरण :-
हेनरी फोर्ड की कार कंपनी ने “मॉडल टी” कार का बड़े पैमाने पर उत्पादन किया, जिससे कार आम लोगों की पहुँच में आ गई और अमेरिकी उपभोग संस्कृति की शुरुआत हुई।
प्रश्न :- महामंदी क्या थी और इसके कारण क्या थे?
उत्तर :- महामंदी 1929 में शुरू हुई और 1930 के दशक के मध्य तक जारी रही। इस दौरान विश्व के अधिकांश देशों में उत्पादन, रोजगार, आय और व्यापार में भारी गिरावट आई।
महामंदी के निम्नलिखित प्रमुख कारण थे :-
1. युद्धोत्तर अर्थव्यवस्था कमजोर हो चुकी थी।
2. कीमतें गिरने लगीं, जिससे किसानों की आय घट गई।
3. किसानों ने आमदनी बढ़ाने के लिए अधिक उत्पादन करना शुरू किया, जिससे स्थिति और बिगड़ी।
4. कई देशों ने अमेरिका से कर्ज लिया, लेकिन अमेरिकी उद्योगपतियों ने मंदी की आशंका देखते हुए कर्ज देना बंद कर दिया।
5. इसके परिणामस्वरूप हजारों बैंक दिवालिया हो गए और आर्थिक संकट गहरा गया।
उदाहरण :-
अमेरिका में स्टॉक मार्केट क्रैश 1929 में हुआ, जिससे निवेशकों के लाखों डॉलर डूब गए और बैंकिंग प्रणाली पर बड़ा संकट आया।
प्रश्न :- भारत पर महामंदी का प्रभाव क्या पड़ा?
उत्तर :- 1928 से 1934 के बीच भारत पर महामंदी के निम्नलिखित गंभीर प्रभाव पड़े।
1. इस दौरान देश का आयात और निर्यात लगभग आधा रह गया।
2. अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कीमतें गिरने से गेहूँ की कीमत 50 प्रतिशत तक गिर गई।
3. किसानों और काश्तकारों को भारी नुकसान हुआ।
4. महामंदी ने शहरी जनता और अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित किया।
5. 1931 में मंदी चरम सीमा पर पहुँच गई, जिससे ग्रामीण भारत में असंतोष और उथल-पुथल का दौर शुरू हो गया।
उदाहरण :-
उत्तर प्रदेश और पंजाब के किसानों को गेहूँ की घटती कीमतों के कारण भारी आर्थिक संकट झेलना पड़ा।
प्रश्न :- युद्धोत्तर काल में विश्व अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण में मुख्य सुधार तथा समझौते क्या थे?
उत्तर :- दूसरे विश्व युद्ध के बाद विश्व की अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना पर गहरा प्रभाव पड़ा। युद्ध के बाद के सुधार मुख्य रूप से अमेरिका और सोवियत संघ के उदय और अंतरराष्ट्रीय नीतियों पर आधारित थे। अमेरिका पश्चिम में एक प्रबल आर्थिक, राजनैतिक और सामरिक शक्ति के रूप में उभरा। सोवियत यूनियन ने कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था से विश्व शक्ति बनने की दिशा में कदम बढ़ाया।
अंतरराष्ट्रीय नेताओं की बैठक में युद्धोत्तर सुधारों तथा निम्नलिखित विषयों पर चर्चा हुई :-
1. औद्योगिक देशों में आर्थिक संतुलन बनाए रखना और पूर्ण रोजगार सुनिश्चित करना।
2. पूँजी, सामान और कामगारों के प्रवाह पर बाहरी दुनिया के प्रभाव को नियंत्रित करना भी महत्वपूर्ण रणनीति थी।
उदाहरण :-
युद्धोत्तर जर्मनी और जापान में अमेरिका द्वारा आर्थिक मदद और पुनर्निर्माण योजनाएँ लागू की गईं, जिससे इन देशों की अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित किया गया।
प्रश्न :- ब्रेटन वुड्स समझौता क्या था?
उत्तर :- ब्रेटन वुड्स समझौता 1944 में अमेरिका के न्यू हैम्पशायर में हुआ एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन था, जिसमें वैश्विक आर्थिक और मौद्रिक व्यवस्था को स्थिर करने के लिए निम्नलिखित निर्णय लिए गए :-
1. इस सम्मेलन में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक (World Bank) की स्थापना हुई।
2. ब्रेटन वुड्स व्यवस्था निश्चित विनिमय दरों (Fixed Exchange Rates) पर आधारित थी।
3. इसका उद्देश्य युद्धोत्तर वैश्विक अर्थव्यवस्था को स्थिर करना और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को सुचारू बनाना था।
उदाहरण :-
IMF और World Bank के माध्यम से देशों को ऋण और तकनीकी सहायता दी जाने लगी, जिससे वे युद्धोत्तर आर्थिक सुधार और विकास कर सकें।
प्रश्न :- नया अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक आदेश (NIEO) क्या था?
उत्तर :- नया अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक आदेश (NIEO) :- 1950 और 60 के दशक में विकसित हुआ एक वैश्विक आर्थिक प्रस्ताव था, जिसका उद्देश्य विकासशील देशों के आर्थिक हितों की रक्षा करना था।
1. उस समय अधिकांश विकासशील देशों को पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं के तेज विकास से लाभ नहीं मिला।
2. इन देशों ने खुद को G-77 के रूप में एक समूह के रूप में संगठित किया।
3. NIEO का उद्देश्य था विकासशील देशों को अपने प्राकृतिक संसाधनों पर अधिक नियंत्रण, कच्चे माल के लिए उचित मूल्य, और विकसित देशों के बाजारों में अपने उत्पादों की बेहतर पहुंच प्रदान करना। उदाहरण :- G-77 समूह ने पेट्रोलियम निर्यातक देशों और अन्य कच्चे माल के उत्पादक देशों के लिए वैश्विक मूल्य निर्धारण और बाजार पहुंच सुनिश्चित करने के लिए NIEO का समर्थन किया।
प्रश्न :- चीन में नई आर्थिक नीति क्या थी?
उत्तर :- चीन में लागू नई आर्थिक नीति ने देश को वैश्विक अर्थव्यवस्था से जोड़ने में निम्नलिखित तरीके से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई :-
1. चीन में मजदूरी बहुत कम थी, जिससे उत्पादन लागत कम रही।
2. कम लागत वाली संरचना ने चीनी उत्पादों को अंतर्राष्ट्रीय बाजार में सस्ता और प्रतिस्पर्धी बना दिया।
3. चीन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए निवेश का पसंदीदा स्थान बन गया।
4. नई आर्थिक नीति ने चीन को वैश्विक आर्थिक प्रणाली में सक्रिय खिलाड़ी बना दिया।
उदाहरण :-
बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ चीन में फैक्ट्री स्थापित करके सस्ते उत्पाद बनाने लगीं और उन्हें दुनिया भर में निर्यात करने लगीं।
प्रश्न :- बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ क्या हैं?
उत्तर :- बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ (MNCs) :- वे बड़ी कंपनियाँ होती हैं जो एक ही समय में कई देशों में उत्पादन, व्यापार और निवेश करती हैं।
बहुराष्ट्रीय कंपनियाें के विषय में मुख्य बिंदु निम्नलिखित है :-
1. एमएनसी का वैश्विक प्रसार 1950 और 1960 के दशकों में हुआ, जब अमेरिकी व्यापार दुनिया भर में फैल रहा था।
2. विभिन्न देशों द्वारा लगाए गए उच्च आयात शुल्क ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपनी विनिर्माण इकाइयाँ विदेशों में स्थापित करने के लिए मजबूर किया।
3. ये कंपनियाँ उत्पादन, विपणन और वितरण के अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्क के माध्यम से वैश्विक व्यापार को प्रभावित करती हैं।
उदाहरण :-
कोका-कोला, मैकडॉनल्ड्स और मोबिल जैसी कंपनियाँ कई देशों में फैक्ट्री और कार्यालय स्थापित करके स्थानीय बाजारों में अपने उत्पाद बेचती हैं।
प्रश्न :- वीटो क्या है?
उत्तर :- वीटो :- वीटो का अर्थ है किसी कानून या प्रस्ताव को अस्वीकार करने का संवैधानिक अधिकार।
वीटो के विषय में मुख्य बिंदु निम्नलिखित है :-
1. यह अधिकार किसी व्यक्ति या निकाय को दिया जाता है ताकि वे किसी प्रस्ताव को लागू होने से रोक सकें।
2. आमतौर पर राष्ट्रपति, सरकार के प्रमुख या अन्य संवैधानिक पदाधिकारी को यह अधिकार होता है।
3. वीटो का प्रयोग कानून, नीतियों या अंतर्राष्ट्रीय समझौतों को रोके जाने के लिए किया जाता है।
उदाहरण :-
यदि संसद में कोई बिल पास होता है, तो राष्ट्रपति के पास उसे अस्वीकार करने का वीटो अधिकार होता है।
प्रश्न :- टैरिफ क्या है?
उत्तर :- टैरिफ :- एक कर है जो किसी देश के आयात या निर्यात पर दूसरे देश द्वारा लगाया जाता है। इसे आमतौर पर सीमा शुल्क के रूप में लागू किया जाता है।
टैरिफ के विषय में मुख्य बिंदु निम्नलिखित है :-
1. यह कर आमतौर पर सीमा, हवाई अड्डे या बंदरगाह पर लगाया जाता है।
2. टैरिफ का उद्देश्य घरेलू उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से सुरक्षा देना होता है।
3. यह सरकार की आय बढ़ाने का एक साधन भी होता है।
उदाहरण :-
यदि भारत विदेशी मोबाइल फोन आयात करता है, तो उस पर सीमा शुल्क (टैरिफ) लगाया जा सकता है।
प्रश्न :- विनिमय दर क्या होती हैं?
उत्तर :- विनिमय दर :- वे दर हैं जो अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में एक देश की मुद्रा को दूसरे देश की मुद्रा से जोड़ती हैं।
विनिमय दर के विषय में मुख्य बिंदु निम्नलिखित है :-
1. यह दर यह तय करती है कि एक देश की मुद्रा के कितने इकाई अन्य देश की मुद्रा के बराबर हैं।
2. विनिमय दरें दो प्रकार की होती हैं – निश्चित विनिमय दर और अस्थायी विनिमय दर।
3. निश्चित विनिमय दर में मुद्रा का मूल्य किसी अन्य मुद्रा या सोने से स्थिर रखा जाता है।
4. अस्थायी विनिमय दर में मुद्रा का मूल्य बाज़ार की मांग और आपूर्ति के अनुसार बदलता रहता है।
उदाहरण :-
यदि 1 अमेरिकी डॉलर = 83 भारतीय रुपये है, तो यह विनिमय दर बताती है कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में 1 डॉलर के लिए कितने रुपये चुकाने होंगे।
प्रश्न :- पिछले दो दशकों में विश्व अर्थव्यवस्था में क्या प्रमुख बदलाव हुए हैं?
उत्तर :- पिछले दो दशकों में विश्व अर्थव्यवस्था में निम्नलिखित महत्वपूर्ण बदलाव देखे गए हैं :-
1. चीन, भारत और ब्राजील जैसे विकासशील देशों ने तेज़ी से आर्थिक विकास किया।
2. इन देशों के आर्थिक उदय ने वैश्विक व्यापार और निवेश के प्रवाह को प्रभावित किया।
3. अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में नई ताकतें उभरीं और वैश्विक उत्पादन तथा उपभोग के केंद्र बदलने लगे।
4. तकनीक और सूचना प्रौद्योगिकी ने व्यापार और आर्थिक लेन-देन में तेजी लाई।
उदाहरण :-
चीन की विनिर्माण क्षमता बढ़ने से विश्व बाज़ार में सस्ते उत्पाद उपलब्ध हुए, और भारत की सूचना प्रौद्योगिकी सेवाओं ने वैश्विक सेवा क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया।