Class 10 history Notes in hindI Chapter - 2
Chapter 2: Nationalism in India
Chapter Introduction:
This chapter discusses the growth of nationalism in India during the freedom struggle. It explains major movements, leaders, and events that played a crucial role in India’s fight for independence. The content is presented in a simple question–answer format for better understanding.
FAQ
Ques. Is this chapter important for long-answer questions?
Ans. Yes, questions related to Indian nationalism are commonly asked as long-answer questions in exams.
CLASS 10 HISTORY NOTES IN HINDI
CHAPTER 2 : भारत में राष्ट्रवाद
प्रश्न :- भारत में राष्ट्रवाद के विकास की प्रमुख घटनाएँ समय के अनुसार कौन-कौन सी थीं?
उत्तर :- भारत में राष्ट्रवाद एक लम्बी ऐतिहासिक प्रक्रिया के परिणामस्वरूप विकसित हुआ। नीचे दी गई तालिका में समय के अनुसार प्रमुख घटनाएँ दी गई हैं :-
वर्ष | घटना |
1857 | प्रथम स्वतंत्रता संग्राम हुआ। |
1870 | बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने “वंदेमातरम” की रचना की। |
1885 | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना बम्बई में हुई; प्रथम अध्यक्ष – व्योमेश चंद्र बनर्जी। |
1905 | लॉर्ड कर्जन ने बंगाल विभाजन का प्रस्ताव किया। |
1905 | अबनीन्द्रनाथ टैगोर ने भारत माता का चित्र बनाया। |
1906 | आगा खां एवं नवाब सलीमुल्ला ने मुस्लिम लीग की स्थापना की। |
1907 | कांग्रेस का विभाजन नरम दल एवं गरम दल में हुआ। |
1911 | दिल्ली दरबार में बंगाल विभाजन रद्द, राजधानी कोलकाता से दिल्ली स्थानांतरित की गई। |
1914 | प्रथम विश्व युद्ध का आरंभ हुआ। |
1915 | महात्मा गांधी का दक्षिण अफ्रीका से स्वदेश वापसी। |
1917 | गांधीजी ने चंपारण में नील किसानों के लिए आंदोलन किया। |
1917 | गांधीजी ने खेड़ा जिले के किसानों के लिए सत्याग्रह किया। |
1918 | गांधीजी ने अहमदाबाद में सूती मिल मजदूरों के लिए सत्याग्रह किया। |
1918 | प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति; ब्रिटिशों ने स्वशासन की माँग ठुकराई। |
1919 | रॉलट एक्ट पारित; 13 अप्रैल को जलियाँवाला बाग हत्याकांड। |
1919 | खिलाफत आंदोलन की शुरुआत – मुहम्मद अली व शौकत अली द्वारा। |
1920 | गांधीजी ने असहयोग आंदोलन प्रारंभ किया। |
1922 | चौरी-चौरा की हिंसक घटना के बाद गांधीजी ने असहयोग आंदोलन वापस लिया। |
1925 | काकोरी कांड – क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी खजाना लूटा (9 अगस्त)। |
1928 | साइमन कमीशन का विरोध करते हुए लाला लाजपत राय की मृत्यु। |
1929 | भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त ने असेम्बली में बम फेंका (8 अप्रैल)। |
1930 | महात्मा गांधी ने दांडी यात्रा (12 मार्च) शुरू की। |
1930 | दांडी पहुँचकर नमक कानून तोड़ा – सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत (6 अप्रैल)। |
1930 | डॉ. भीमराव अंबेडकर ने दमित वर्ग संघ की स्थापना की। |
1931 | भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु को फाँसी (23 मार्च)। |
1931 | गांधी-इरविन समझौता, सविनय अवज्ञा आंदोलन वापस। |
1931 | गांधीजी ने द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया (लंदन)। |
1932 | पूना पैक्ट – गांधीजी व अंबेडकर के बीच समझौता। |
1933 | चौधरी रहमत अली ने “पाकिस्तान” का विचार प्रस्तुत किया। |
1935 | भारत शासन अधिनियम पारित; प्रांतीय सरकारों का गठन। |
1939 | द्वितीय विश्व युद्ध का आरंभ। |
1940 | लाहौर अधिवेशन – मुस्लिम लीग द्वारा पाकिस्तान की माँग। |
1942 | भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत; नारा – “करो या मरो”। |
1945 | अमेरिका द्वारा परमाणु हमला, द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त। |
1946 | कैबिनेट मिशन भारत आया – संविधान सभा का प्रस्ताव। |
1947 | 15 अगस्त 1947 – भारत आज़ाद हुआ। |
नोट :-
महात्मा गांधी के नेतृत्व में दांडी यात्रा और असहयोग आंदोलन ने भारतीय राष्ट्रवाद को नई दिशा दी और अंग्रेजी शासन के खिलाफ देशव्यापी एकता का प्रतीक बने।
प्रश्न :- राष्ट्रवाद से आप क्या समझते हैं?
उत्तर :- राष्ट्रवाद :- वह भावना है जो लोगों को अपने राष्ट्र के प्रति प्रेम, एकता और समान चेतना से जोड़ती है। यह लोगों में देश के प्रति निष्ठा और गर्व की भावना उत्पन्न करती है।
राष्ट्रवाद के मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित है :-
1. अपने राष्ट्र के प्रति प्रेम और समर्पण की भावना।
2. एकता और भाईचारे की भावना का विकास।
3. समान ऐतिहासिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विरासत को साझा करना।
4. विभिन्न भाषाई या प्रांतीय समूहों के बावजूद एक राष्ट्र के रूप में एकजुट रहना।
उदाहरण :-
भारत में विभिन्न भाषाओं, संस्कृतियों और धर्मों के लोग होने के बावजूद सभी में मातृभूमि के प्रति समान प्रेम और निष्ठा की भावना राष्ट्रवाद का उदाहरण है।
प्रश्न :- राष्ट्रवाद को जन्म देने वाले प्रमुख कारक कौन-कौन से थे?
उत्तर :- राष्ट्रवाद को जन्म देने वाले कारक :- विभिन्न देशों में भिन्न थे। यूरोप में यह राष्ट्र राज्यों के निर्माण से जुड़ा था, जबकि भारत और वियतनाम जैसे देशों में यह विदेशी शासन के विरोध से संबंधित था।
राष्ट्रवाद को जन्म देने वाले प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं :-
1. यूरोप में – राष्ट्रवाद का उदय राष्ट्र राज्यों के गठन और एकीकरण से जुड़ा हुआ था।
2. भारत, वियतनाम जैसे उपनिवेशों में – राष्ट्रवाद का संबंध उपनिवेशवाद के विरोध और स्वतंत्रता आंदोलन से था।
उदाहरण :-
भारत में ब्रिटिश शासन के विरोध से राष्ट्रीय आंदोलन प्रारंभ हुआ, जबकि यूरोप में फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों में राष्ट्रवाद ने एकीकृत राष्ट्र राज्य के निर्माण को प्रेरित किया।
प्रश्न :- भारत में राष्ट्रवाद की भावना पनपने के प्रमुख कारक कौन-कौन से थे?
उत्तर :- भारत में राष्ट्रवाद की भावना पनपने के प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं :-
1. साहित्य, लोककथाओं, गीतों व चित्रों के माध्यम से राष्ट्रवाद का प्रसार हुआ।
2. भारत माता की छवि राष्ट्र का प्रतीक रूप लेने लगी।
3. लोककथाओं के माध्यम से राष्ट्रीय पहचान को बल मिला।
4. चिह्नों और प्रतीकों के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ी — जैसे राष्ट्रध्वज (झंडा)।
5. इतिहास की पुनर्व्याख्या की गई, ताकि भारत के गौरवशाली अतीत से प्रेरणा ली जा सके।
उदाहरण :-
“भारत माता” की पेंटिंग ने लोगों में देश के प्रति भक्ति और एकता की भावना को प्रबल किया, जिससे राष्ट्रवाद के प्रसार में मदद मिली।
नोट :-
भारत में राष्ट्रवाद की भावना धीरे-धीरे विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और कलात्मक माध्यमों से फैली। इन माध्यमों ने लोगों में एकता, गौरव और देशभक्ति की भावना को मजबूत किया।
प्रश्न :- प्रथम विश्वयुद्ध का भारत पर क्या प्रभाव पड़ा तथा युद्ध के बाद की परिस्थितियाँ कैसी थीं?
उत्तर :- प्रथम विश्वयुद्ध का भारत पर प्रभाव एवं युद्ध पश्चात परिस्थितियाँ निम्नलिखित थीं :-
1. रक्षा खर्चों में बढ़ोतरी हुई, जिससे ब्रिटिश सरकार ने अधिक कर्ज़ लिए।
2. अतिरिक्त राजस्व जुटाने हेतु कस्टम ड्यूटी और इनकम टैक्स बढ़ा दिए गए।
3. युद्ध के दौरान वस्तुओं की कीमतें बहुत बढ़ गईं — 1913 से 1918 के बीच दाम लगभग दोगुने हो गए।
4. मुद्रास्फीति के कारण आम जनता को भारी आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
5. ग्रामीण इलाकों में जबरन सेना भर्ती किए जाने से जनता में असंतोष फैल गया।
6. कई भागों में फसल खराब होने से भोजन की कमी हो गई।
7. फ़्लू (Influenza) महामारी ने हालात और भी खराब कर दिए।
8. 1921 की जनगणना के अनुसार, अकाल और महामारी से लगभग 120 से 130 लाख लोग मारे गए।
उदाहरण :-
प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान बढ़ती महंगाई और जबरन भर्ती की नीति से किसानों व मजदूरों में असंतोष फैल गया, जिसने आगे चलकर असहयोग आंदोलन को जन्म दिया।
नोट :-
प्रथम विश्वयुद्ध का भारत पर गहरा प्रभाव पड़ा। युद्ध के दौरान और उसके बाद की परिस्थितियों ने भारतीय समाज, अर्थव्यवस्था और जनता के जीवन को अत्यंत प्रभावित किया।
प्रश्न :- सत्याग्रह का क्या अर्थ है?
उत्तर :- सत्याग्रह का अर्थ :- सत्याग्रह एक ऐसा आंदोलन था जो सत्य और अहिंसा पर आधारित था। यह एक नए प्रकार का जन आंदोलन करने का तरीका था, जिसमें हिंसा का प्रयोग किए बिना अन्याय का विरोध किया जाता था।
प्रश्न :- महात्मा गांधी के अनुसार सत्याग्रह का क्या अर्थ था?
उत्तर :- महात्मा गांधी के सत्याग्रह का अर्थ :-
1. सत्याग्रह का मूल आधार सत्य और अहिंसा था।
2. गांधीजी का मानना था कि सत्य की शक्ति हिंसा से अधिक प्रभावशाली होती है।
3. यदि कोई व्यक्ति सही उद्देश्य के लिए संघर्ष करता है, तो उसे अत्याचारी से लड़ने के लिए बल या हिंसा की आवश्यकता नहीं होती।
4. अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए एक सत्याग्रही भी अन्याय पर विजय प्राप्त कर सकता है।
उदाहरण :-
महात्मा गांधी ने चंपारण सत्याग्रह (1917) में किसानों के अधिकारों के लिए बिना हिंसा के संघर्ष किया और सफलता प्राप्त की।
प्रश्न :- महात्मा गांधी द्वारा भारत में किए गए प्रारंभिक सत्याग्रह आंदोलन कौन-कौन से थे?
उत्तर :- महात्मा गांधी द्वारा भारत में किए गए सत्याग्रह के आरंभ :-
1. 1915 ई. में महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे।
2. उनकी जन आंदोलन की पद्धति को “सत्याग्रह” कहा गया, जो सत्य और अहिंसा पर आधारित थी।
3. चंपारण (बिहार) सत्याग्रह, 1917 – नील की खेती करने वाले किसानों को दमनकारी बागान व्यवस्था से मुक्ति दिलाने के लिए आंदोलन किया।
4. खेड़ा (गुजरात) सत्याग्रह, 1917 – फसल खराब होने व प्लेग महामारी के कारण लगान न चुकाने की स्थिति में किसानों को कर में छूट दिलाने हेतु समर्थन दिया।
5. अहमदाबाद (गुजरात) सत्याग्रह, 1918 – कपड़ा मिल के मजदूरों के वेतन बढ़ाने के लिए उनके समर्थन में सत्याग्रह आंदोलन चलाया।
प्रश्न :- रॉलैट ऐक्ट 1919 क्या था? इसके प्रावधान, विरोध और परिणामों को विस्तार से समझाइए।
उत्तर :- रॉलैट ऐक्ट 1919 :- 1919 में इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल द्वारा रॉलैट ऐक्ट पारित किया गया था। भारतीय सदस्यों ने इस ऐक्ट का कड़ा विरोध किया, फिर भी यह कानून पारित कर दिया गया। इस कानून ने सरकार को राजनीतिक गतिविधियों को कुचलने के लिए असीम शक्तियाँ दे दीं।
रॉलैट ऐक्ट के मुख्य प्रावधान :-
1. बिना मुकदमे (ट्रायल) के राजनीतिक कैदियों को दो वर्ष तक जेल में रखा जा सकता था।
2. सरकार को संदेह के आधार पर किसी को भी गिरफ्तार करने का अधिकार मिल गया।
रॉलैट ऐक्ट के विरोध की शुरुआत :-
1. 6 अप्रैल 1919 को महात्मा गांधी ने इसके विरोध में राष्ट्रव्यापी आंदोलन की शुरुआत की।
2. जनता ने हड़तालों और जुलूसों के माध्यम से विरोध जताया।
3. कई दुकानें बंद रहीं और रेलवे कारखानों के मजदूरों ने काम बंद कर दिया।
ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया :-
1. अंग्रेजी हुकूमत ने राष्ट्रवादियों पर कठोर कदम उठाए।
2. कई स्थानीय नेताओं को गिरफ्तार किया गया।
3. महात्मा गांधी को दिल्ली में प्रवेश करने से रोका गया।
रॉलट ऐक्ट के परिणाम :-
1. 6 अप्रैल 1919 को महात्मा गांधी के नेतृत्व में अखिल भारतीय हड़ताल का आयोजन हुआ।
2. कई शहरों में रैली और जुलूस निकाले गए।
3. रेलवे वर्कशॉप्स में हड़ताल हुई और दुकानें बंद रहीं।
4. स्थानीय नेताओं को गिरफ्तार किया गया।
5. बैंक, डाकखाने और रेलवे स्टेशन पर जनता का आक्रोश दिखाई दिया।
नोट :-
रॉलैट ऐक्ट के विरोध से उपजे जन असंतोष ने जलियाँवाला बाग हत्याकांड (13 अप्रैल 1919) जैसी त्रासदी को जन्म दिया, जिसने पूरे देश में ब्रिटिश शासन के प्रति आक्रोश फैला दिया।
प्रश्न :- जलियांवाला बाग हत्याकांड की घटना का वर्णन कीजिए।
उत्तर :- जलियांवाला बाग हत्याकांड की घटना (13 अप्रैल 1919) :-
पृष्ठभूमि :-
1. 10 अप्रैल 1919 को अमृतसर में पुलिस ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई।
2. इसके विरोध में लोगों ने सरकारी संस्थानों पर आक्रमण किया।
3. स्थिति बिगड़ने पर मार्शल लॉ लागू कर दिया गया और जनरल डायर को विशेष अधिकार दे दिए गए।
हत्याकांड की घटना :-
13 अप्रैल 1919 को पंजाब में बैसाखी का पर्व मनाया जा रहा था। अनेक ग्रामीण लोग जलियांवाला बाग में लगे मेले में शामिल होने आए थे। यह बाग चारों ओर से दीवारों से घिरा था और निकास द्वार बहुत संकीर्ण थे। जनरल डायर ने बिना चेतावनी के बाग के द्वार बंद करवा दिए और भीड़ पर अंधाधुंध गोलियाँ चलवा दीं। इस गोलीबारी में सैकड़ों लोग मारे गए और हजारों घायल हुए।
परिणाम :-
1. सरकार का रवैया अत्यंत निर्दयी और क्रूर था।
2. पूरे देश में आक्रोश और हिंसा फैल गई।
3. महात्मा गांधी ने आंदोलन वापस ले लिया, क्योंकि वे हिंसा के पक्षधर नहीं थे।
नोट :-
जलियांवाला बाग की यह घटना भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक turning point साबित हुई, जिसने पूरे देश में ब्रिटिश शासन के प्रति गहरा रोष और एकता की भावना जगा दी।
प्रश्न :- जलियांवाला बाग हत्याकांड का क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर :- जलियांवाला बाग हत्याकांड का प्रभाव :-
1. भारत के अनेक शहरों में लोग सड़कों पर उतर आए।
2. हड़तालें शुरू हुईं और जनता ने पुलिस तथा सरकारी अधिकारियों से टकराव शुरू कर दिया।
3. सरकार ने कठोर और निर्दयी रवैया अपनाया।
4. लोगों को अपमानित व आतंकित किया गया।
5. सत्याग्रहियों को जबरदस्ती नाक रगड़ने, सड़क पर घिसकर चलने और अंग्रेज अधिकारियों को सलाम करने के लिए बाध्य किया गया।
6. कई लोगों को कोड़े मारे गए तथा गुजरांवाला (पंजाब) के कुछ गांवों पर हवाई जहाज़ से बम गिराए गए।
7. हिंसा फैलने के कारण महात्मा गांधी ने रॉलट सत्याग्रह वापस ले लिया।
नोट :-
इस घटना ने ब्रिटिश शासन की क्रूरता को उजागर किया और भारतीयों में स्वराज के लिए संघर्ष की भावना को और अधिक प्रबल बना दिया।
प्रश्न :- आंदोलन के विस्तार की आवश्यकता क्यों महसूस की गई?
उत्तर :- आंदोलन के विस्तार की आवश्यकता :-
1. रॉलैट सत्याग्रह मुख्यतः शहरी क्षेत्रों तक सीमित था।
2. गाँधीजी का मानना था कि आंदोलन को देश के कोने-कोने तक पहुँचाना जरूरी है।
3. इसके लिए आवश्यक था कि ग्रामीण जनता भी आंदोलन से जुड़ सके।
4. गाँधीजी को विश्वास था कि आंदोलन का सही विस्तार तभी होगा जब हिंदू और मुसलमान एकजुट होकर संघर्ष करें।
5. राष्ट्रीय एकता और साम्प्रदायिक सौहार्द आंदोलन की शक्ति को कई गुना बढ़ा सकता था।
नोट :-
महात्मा गांधी ने ख़िलाफ़त आंदोलन का समर्थन करके हिंदू-मुस्लिम एकता को मजबूत करने की कोशिश की ताकि राष्ट्रव्यापी स्वतंत्रता आंदोलन को बल मिल सके।
प्रश्न :- खिलाफत का मुद्दा क्या था?
उत्तर :- खिलाफत का मुद्दा :-
1. “खिलाफत” शब्द “खलीफा” से बना है, जो ऑटोमन तुर्की का सम्राट और इस्लामिक जगत का आध्यात्मिक नेता था।
2. प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की की हार के बाद यह आशंका व्यक्त की गई कि तुर्की पर अपमानजनक संधि थोपी जाएगी।
3. इससे मुस्लिम समुदाय में असंतोष फैल गया क्योंकि इससे खलीफा की धार्मिक सत्ता कमजोर होने का डर था।
4. खलीफा की शक्तियों की रक्षा हेतु मार्च 1919 में अली बंधुओं (मुहम्मद अली और शौकत अली) ने बम्बई में खिलाफत समिति की स्थापना की।
5. इस समिति का उद्देश्य था — तुर्की के खलीफा की प्रतिष्ठा व अधिकारों की रक्षा करना।
प्रश्न :- महात्मा गांधी ने खिलाफत का मुद्दा क्यों उठाया?
उत्तर :- महात्मा गांधी द्वारा खिलाफत का मुद्दा उठाने के कारण :-
1. रॉलट सत्याग्रह की असफलता के बाद, गांधीजी एक व्यापक जनाधार वाला राष्ट्रीय आंदोलन शुरू करना चाहते थे।
2. उनका मानना था कि हिंदू और मुसलमानों की एकता के बिना कोई भी अखिल भारतीय आंदोलन सफल नहीं हो सकता।
3. खिलाफत आंदोलन उस समय मुस्लिम समुदाय के लिए अत्यंत भावनात्मक मुद्दा था।
4. गांधीजी ने समझा कि यदि खिलाफत आंदोलन को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा जाए, तो इससे दोनों समुदायों की एकता बढ़ेगी।
5. इस प्रकार उन्होंने खिलाफत के प्रश्न को असहयोग आंदोलन से जोड़कर स्वतंत्रता संग्राम को राष्ट्रव्यापी स्वरूप दिया।
नोट :-
महात्मा गांधी ने 1919-1920 में खिलाफत आंदोलन का समर्थन करते हुए हिंदू-मुस्लिम एकता पर बल दिया, जिससे असहयोग आंदोलन की नींव मजबूत हुई।
प्रश्न :- हिंद स्वराज क्या है?
उत्तर :- हिंद स्वराज :-
1. यह महात्मा गांधी द्वारा लिखित प्रसिद्ध पुस्तक है।
2. पुस्तक में भारत में ब्रिटिश शासन के असहयोग और स्वराज की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
3. गांधीजी ने इसमें बताया कि देश की स्वतंत्रता केवल अहिंसात्मक प्रतिरोध और स्वदेशी के माध्यम से प्राप्त की जा सकती है।
4. यह ग्रंथ राष्ट्रीय जागरूकता और स्वतंत्रता संग्राम की सोच को प्रबल करने वाला है।
नोट :-
इस पुस्तक के माध्यम से गांधीजी ने भारतीयों को ब्रिटिश शासन के खिलाफ अहिंसात्मक असहयोग की ओर प्रेरित किया।
प्रश्न :- असहयोग आंदोलन की आवश्यकता क्यों पड़ी? / महात्मा गांधी ने “असहयोग क्यों” कहा?
उत्तर :- असहयोग आंदोलन की आवश्यकता इसलिए पड़ी क्योंकि :-
1. गांधीजी का विचार :- महात्मा गांधी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “हिंद स्वराज” (1909) में कहा कि भारत में अंग्रेजी शासन इसलिए कायम है क्योंकि भारतीयों ने उनका सहयोग किया।
2. अंग्रेजी शासन की कमजोरी :- गांधीजी के अनुसार, अगर भारतीय अंग्रेजों का सहयोग बंद कर दें, तो अंग्रेजी शासन एक वर्ष के भीतर गिर जाएगा।
3. असहयोग का अर्थ :- गांधीजी ने कहा कि अहिंसात्मक असहयोग के माध्यम से ही अंग्रेजों की नींव हिलाई जा सकती है।
4. स्वराज की राह :- उनका विश्वास था कि यदि भारतीय लोग एकजुट होकर सहयोग देना बंद करें, तो अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाना पड़ेगा और “स्वराज” (स्वशासन) प्राप्त होगा।
उदाहरण :-
गांधीजी के असहयोग के विचार से प्रेरित होकर 1920 में असहयोग आंदोलन शुरू हुआ, जिसने स्वतंत्रता संग्राम को जन-आंदोलन का रूप दिया।
प्रश्न :- असहयोग आंदोलन के प्रमुख कारण क्या थे?
उत्तर :- असहयोग आंदोलन की शुरुआत कई राजनीतिक और सामाजिक कारणों से हुई।
इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं :-
प्रथम विश्व युद्ध का प्रभाव :- युद्ध की समाप्ति के बाद भी अंग्रेजों ने भारतीय जनता का आर्थिक शोषण जारी रखा।
स्वराज से मुकर जाना :- अंग्रेज सरकार ने भारतीयों से स्वराज देने का वादा किया था, लेकिन बाद में उससे मुकर गई।
रॉलेट एक्ट 1919 :- इस कानून के द्वारा भारतीयों की स्वतंत्रता छीन ली गई और उन्हें बिना मुकदमे के जेल में डालने की अनुमति दी गई।
जलियाँवाला बाग हत्याकांड :- 13 अप्रैल 1919 की इस नृशंस घटना ने पूरे देश को क्रोधित कर दिया और असहयोग की भावना को बढ़ाया।
कांग्रेस का निर्णय :- 1920 के कलकत्ता अधिवेशन में कांग्रेस ने असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव बहुमत से पारित किया।
नोट :-
इन सभी कारणों से प्रेरित होकर 1920 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन प्रारंभ हुआ, जिसने स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी।
प्रश्न :- असहयोग आंदोलन के प्रमुख प्रस्ताव क्या थे?
उत्तर :- असहयोग आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी ने अंग्रेजी शासन से असहयोग के लिए निम्नलिखित प्रमुख प्रस्ताव रखे थे :-
1. सरकारी उपाधियों का परित्याग :- अंग्रेजी सरकार द्वारा दी गई उपाधियाँ, सम्मान और पदवियाँ वापस करने का प्रस्ताव रखा गया।
2. सरकारी संस्थानों का बहिष्कार :- लोगों से आग्रह किया गया कि वे सिविल सर्विस, सेना, पुलिस, अदालत, लेजिस्लेटिव काउंसिल और सरकारी स्कूलों का बहिष्कार करें।
3. विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार :- भारतीयों से कहा गया कि वे विदेशी कपड़ों और वस्तुओं का उपयोग बंद करें और स्वदेशी वस्तुओं को अपनाएँ।
4. सविनय अवज्ञा की चेतावनी :- यदि अंग्रेज सरकार अपनी दमनकारी नीतियाँ जारी रखे, तो पूर्ण सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने का प्रस्ताव रखा गया।
नोट :-
इन प्रस्तावों के माध्यम से गांधीजी ने भारतीयों को यह सिखाया कि अहिंसक असहयोग से भी अत्याचारी शासन को कमजोर किया जा सकता है।
प्रश्न :- असहयोग आंदोलन से संबंधित कांग्रेसी अधिवेशन कौन-कौन से थे और उनमें क्या निर्णय लिए गए?
उत्तर :- असहयोग आंदोलन से संबंधित दो प्रमुख कांग्रेसी अधिवेशन हुए :-
1. सितंबर 1920 (कलकत्ता अधिवेशन) :- इस अधिवेशन में असहयोग आंदोलन के विचार को अन्य नेताओं ने स्वीकृति दी। गांधीजी के विचारों को लेकर नेताओं में प्रारंभिक मतभेद थे, परंतु अंततः आंदोलन चलाने की सहमति बनी।
2. दिसंबर 1920 (नागपुर अधिवेशन) :- इस अधिवेशन में असहयोग आंदोलन के प्रस्ताव को औपचारिक रूप से मंजूरी दी गई। कांग्रेस ने आंदोलन की शुरुआत पर अंतिम मुहर लगाई और गांधीजी के नेतृत्व में इसे प्रारंभ करने की सहमति दी।
नोट :-
कलकत्ता अधिवेशन में असहयोग का विचार रखा गया और नागपुर अधिवेशन में इसे आधिकारिक रूप से शुरू करने का निर्णय लिया गया।
प्रश्न :- असहयोग आंदोलन के भीतर अलग-अलग धाराएँ क्यों उत्पन्न हुईं?
उत्तर :- असहयोग-खिलाफत आंदोलन की शुरुआत जनवरी 1921 में हुई थी। इसमें समाज के विभिन्न वर्गों ने भाग लिया, लेकिन उनके स्वराज के अर्थ और उद्देश्य अलग-अलग थे इसलिए असहयोग आंदोलन के भीतर अलग अलग निम्नलिखित धाराएँ उत्पन्न हुईं :-
1. विभिन्न सामाजिक समूहों की भागीदारी :- किसान, मजदूर, व्यापारी, विद्यार्थी, महिलाएँ—सभी वर्ग इस आंदोलन में शामिल हुए।
2. सभी की अपनी-अपनी आकांक्षाएँ थीं :- हर वर्ग ने आंदोलन से अपनी समस्याओं के समाधान की आशा की।
3. ‘स्वराज’ का अलग-अलग अर्थ :-
(i) कुछ लोगों के लिए स्वराज का मतलब अंग्रेजी शासन से मुक्ति था।
(ii) किसानों के लिए इसका अर्थ था लगान से मुक्ति।
(iii) मजदूरों के लिए इसका अर्थ था बेहतर काम की शर्तें।
(iv) व्यापारियों के लिए विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार से आर्थिक स्वावलंबन।
4. सभी के लिए स्वराज = दुखों का अंत :- प्रत्येक समूह ने ‘स्वराज’ को एक ऐसे युग के रूप में देखा जहाँ उनके सभी कष्ट और मुसीबतें समाप्त हो जाएँ।
प्रश्न :- शहरों में असहयोग आंदोलन धीरे-धीरे क्यों धीमा पड़ गया?
उत्तर :- शहरों में असहयोग आंदोलन धीरे-धीरे धीमा पड़ने के निम्नलिखित मुख्य कारण थे :-
1. खादी का कपड़ा महँगा था :- चरखे से बुना हुआ खादी का कपड़ा मिल के कपड़े से महँगा पड़ता था। गरीब लोग इसे खरीद नहीं सकते थे। इसलिए वे लंबे समय तक विदेशी कपड़े का बहिष्कार जारी नहीं रख सके।
2. वैकल्पिक संस्थानों की कमी :- अंग्रेजी स्कूलों और कॉलेजों के स्थान पर भारतीय शिक्षण संस्थान पर्याप्त संख्या में नहीं थे। जो संस्थान बने भी, वे बहुत धीरे-धीरे विकसित हुए।
3. सरकारी संस्थानों में वापसी :- पढ़ाई और रोज़गार की समस्या के कारण छात्र और शिक्षक वापस सरकारी स्कूलों में लौट आए। कई वकील भी अपनी आजीविका चलाने के लिए सरकारी अदालतों में काम पर लौट गए।
प्रश्न :- असहयोग आंदोलन की समाप्ति कब और क्यों हुई?
उत्तर :- असहयोग आंदोलन की समाप्ति के विषय में कुछ मुख्य बिंदु निम्नलिखित है :-
1. समाप्ति का समय :- फरवरी 1922 में महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया।
2. मुख्य कारण :- उत्तर प्रदेश के चौरी चौरा नामक स्थान पर आंदोलनकारी हिंसक हो गए थे। क्रोधित भीड़ ने पुलिस थाने को आग लगा दी, जिसमें 22 पुलिसकर्मी मारे गए। यह घटना गांधीजी के अहिंसा के सिद्धांत के विपरीत थी।
3. गांधीजी का निर्णय :- उन्होंने महसूस किया कि जनता अभी अहिंसक आंदोलन के लिए तैयार नहीं है। इसलिए उन्होंने आंदोलन को तात्कालिक रूप से समाप्त करने का निर्णय लिया।
नोट :-
1922 में हुई चौरी चौरा की घटना के कारण महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन को वापस ले लिया।
प्रश्न :- चौरी चौरा की घटना क्या थी?
उत्तर :- चौरी चौरा की घटना :- यह घटना फरवरी 1922 में घटित हुई थी। उत्तर प्रदेश के चौरी चौरा नामक स्थान पर यह घटना हुई। गांधीजी ने उस समय “नो टैक्स आंदोलन” शुरू करने का निर्णय लिया था। शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों पर पुलिस ने बिना किसी उकसावे के गोली चला दी। इससे लोग गुस्से में आ गए और पुलिस थाने पर हमला कर दिया। क्रोधित भीड़ ने थाने में आग लगा दी, जिसमें 22 पुलिसकर्मी मारे गए।
परिणाम :-
इस हिंसक घटना से महात्मा गांधी अत्यंत दुखी हुए। उन्होंने माना कि जनता अभी अहिंसा के सिद्धांतों का पालन करने के लिए तैयार नहीं है। इसलिए गांधीजी ने असहयोग आंदोलन को वापस ले लिया।
प्रश्न :- सविनय अवज्ञा आंदोलन की पृष्ठभूमि क्या थी?
उत्तर :- सविनय अवज्ञा आंदोलन की पृष्ठभूमि :-
1. असहयोग आंदोलन की वापसी :- 1921 के अंत तक आंदोलन कई जगह हिंसक हो गया था। फरवरी 1922 में महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया।
2. कांग्रेस में मतभेद :- कुछ नेता जनांदोलन से थक गए थे और चाहते थे कि कांग्रेस अब राज्य की परिषदों के चुनावों में हिस्सा ले। ये परिषदें गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ऐक्ट 1919 के तहत बनाई गई थीं।
3. स्वराज पार्टी का गठन :- सी. आर. दास और मोती लाल नेहरू का मानना था कि सिस्टम के अंदर रहकर भी अंग्रेजी नीतियों का विरोध किया जा सकता है। इसलिए उन्होंने जनवरी 1923 में “स्वराज पार्टी” की स्थापना की।
4. आर्थिक स्थिति :- इस समय विश्वव्यापी आर्थिक मंदी के कारण कृषि उत्पादों के दाम गिर गए। ग्रामीण इलाकों में भारी असंतोष और उथल-पुथल फैल गई। किसानों की हालत खराब होती जा रही थी।
प्रश्न :- साइमन कमीशन क्या था और इसका भारत में क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर :- साइमन कमीशन का गठन :- सन् 1927 में ब्रिटेन की सरकार ने साइमन कमीशन का गठन किया। इसका उद्देश्य था — भारत में संवैधानिक व्यवस्था की कार्यशैली का अध्ययन करना।
भारत में आगमन और विरोध :- 1928 में साइमन कमीशन भारत आया। इस आयोग में एक भी भारतीय सदस्य शामिल नहीं था, इसलिए पूरे देश में इसका जबरदस्त विरोध हुआ। लोगों ने नारे लगाए — “साइमन गो बैक”
कांग्रेस का रुख :- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भी इस आयोग का बहिष्कार किया।
लाहौर अधिवेशन (1929) :- दिसंबर 1929 में लाहौर में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। इसके अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू बने। इस अधिवेशन में “पूर्ण स्वराज” (पूर्ण स्वतंत्रता) का प्रस्ताव पारित किया गया।
स्वाधीनता दिवस :- 26 जनवरी 1930 को स्वाधीनता दिवस घोषित किया गया। देशवासियों से संपूर्ण स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने का आह्वान किया गया।
नोट :-
जब साइमन कमीशन भारत आया, तो लाला लाजपत राय के नेतृत्व में लाहौर में इसका विरोध हुआ, जिस दौरान पुलिस लाठीचार्ज में लाला लाजपत राय घायल हो गए और बाद में उनका निधन हो गया।
प्रश्न :- नमक यात्रा और सविनय अवज्ञा आंदोलन 1930 में कैसे शुरू हुआ?
उत्तर :- जनवरी 1930 में महात्मा गांधी ने लार्ड इरविन के समक्ष 11 मांगें रखीं। ये मांगें किसान, मजदूर और उद्योगपतियों जैसे विभिन्न वर्गों से संबंधित थीं। सबसे महत्वपूर्ण मांग थी — नमक कर को खत्म करना। लार्ड इरविन ने इन मांगों को स्वीकार नहीं किया।
नमक यात्रा की शुरुआत :- 12 मार्च 1930 को महात्मा गांधी ने नमक यात्रा (साल्ट मार्च) शुरू की। यह दंडकृत नमक कानून के विरोध में किया गया।
नमक कानून का उल्लंघन :- 6 अप्रैल 1930 को गांधीजी ने समुंद्र किनारे नमक बनाकर ब्रिटिश कानून का उल्लंघन किया। इसी घटना से सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत हुई।
नोट :-
गांधीजी ने अहमदाबाद से डांडी तक 390 किमी की पैदल यात्रा की और समुद्र से नमक बनाकर ब्रिटिश कानून तोड़ा, जिससे पूरे देश में असहयोग और नागरिक अवज्ञा का आंदोलन फैल गया।
प्रश्न :- गांधी–इरविन समझौते की मुख्य विशेषताएँ क्या थीं?
उत्तर :- गांधी–इरविन समझौते की निम्नलिखित मुख्य विशेषताएँ थीं :-
1. 5 मई 1931 ई. को यह समझौता किया गया।
2. सविनय अवज्ञा आंदोलन को स्थगित कर दिया गया।
3. पुलिस द्वारा किए गए अत्याचारों की निष्पक्ष जाँच करने का प्रावधान किया गया।
4. नमक पर लगाए गए सभी कर हटा दिए गए।
प्रश्न :- सविनय अवज्ञा आंदोलन में किसने भाग लिया?
उत्तर :- सविनय अवज्ञा आंदोलन देश के विभिन्न हिस्सों में लागू हुआ।
इस आंदोलन में निम्नलिखित लोगों ने भाग लिया :-
1. गांधीजी और उनके अनुयायी, जिन्होंने साबरमती आश्रम से दांडी तक आंदोलन किया।
2. ग्रामीण इलाकों में, जैसे गुजरात के अमीर पाटीदार और उत्तर प्रदेश के जाट, जो आंदोलन में सक्रिय रहे।
3. व्यापारियों और उद्योगपतियों ने आयातित वस्तुओं को खरीदने और बेचने से इनकार करके आंदोलन का समर्थन किया।
4. नागपुर क्षेत्र के औद्योगिक श्रमिक, रेलवे कर्मचारी, डॉक वर्कर्स और छोटा नागपुर के खनिक भी विरोध रैलियों और बहिष्कार अभियानों में शामिल हुए।
नोट :-
गुजरात के अमीर पाटीदारों और उत्तर प्रदेश के जाटों ने अपने समुदाय में आंदोलन को बढ़ावा देकर सविनय अवज्ञा आंदोलन को मजबूत बनाया।
प्रश्न :- सविनय अवज्ञा आंदोलन की मुख्य घटनाएँ क्या थीं?
उत्तर :- सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान निम्नलिखित मुख्य घटनाएँ हुईं :-
1. देश के विभिन्न हिस्सों में नमक कानून का उल्लंघन किया गया।
2. विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया।
3. शराब की दुकानों की पिकेटिंग की गई।
4. वन कानूनों का उल्लंघन किया गया।
नोट :-
गांधीजी के नेतृत्व में दांडी मार्च के दौरान नमक कानून का उल्लंघन करके आंदोलन ने पूरे देश में तेज़ी पकड़ ली।
प्रश्न :- सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया क्या थी?
उत्तर :- सविनय अवज्ञा आंदोलन में ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया निम्नलिखित थी :-
1. कांग्रेस नेताओं को हिरासत में लिया गया।
2. निर्मम दमन किया गया।
3. शांतिपूर्ण सत्याग्रहियों पर आक्रमण किया गया।
4. महिलाओं और बच्चों की पिटाई की गई।
5. लगभग 1,00,000 लोगों को गिरफ्तार किया गया।
प्रश्न :- सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रति लोगों और औपनिवेशिक सरकार की क्या प्रतिक्रिया थी?
उत्तर :- सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रति लोगों और औपनिवेशिक सरकार की प्रतिक्रियाएँ निम्नलिखित थीं :-
1. लोगों ने सरकारी कानूनों का उल्लंघन करना शुरू कर दिया।
2. आंदोलन को दबाने के लिए ब्रिटिश सरकार ने कठोर कदम उठाए।
3. हजारों आंदोलनकारियों को जेल में डाल दिया गया।
4. गांधीजी को भी गिरफ्तार कर लिया गया।
5. जनता का जोश बढ़ा और वे आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लेने लगे।
6. चौरी चौरा, नागपुर, और गुजरात जैसे क्षेत्रों में लोगों ने कर न देने, विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और सत्याग्रह में सक्रिय भाग लेकर सरकार के विरुद्ध एकजुटता दिखाई।
प्रश्न :- सविनय अवज्ञा आंदोलन की मुख्य विशेषताएँ क्या थीं?
उत्तर :- सविनय अवज्ञा आंदोलन की निम्नलिखित मुख्य विशेषताएँ थीं :-
1. लोगों से केवल अंग्रेज़ों का सहयोग न करने के बजाय, अब ब्रिटिश सरकार के कानूनों का उल्लंघन करने का भी आह्वान किया गया।
2. देशभर में हज़ारों लोगों ने नमक कानून तोड़ा और सरकारी नमक कारखानों के सामने प्रदर्शन किए।
3. विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया और स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग को बढ़ावा दिया गया।
4. किसानों ने लगान न देने और चौकीदारों ने कर चुकाने से इंकार कर दिया।
5. वनों में रहने वाले लोगों ने वन कानूनों का उल्लंघन किया और स्वतंत्र रूप से वनों का उपयोग किया।
नोट :-
12 मार्च 1930 को गांधीजी ने दांडी यात्रा शुरू की और 6 अप्रैल को नमक बनाकर नमक कानून तोड़ा — यही सविनय अवज्ञा आंदोलन की सबसे प्रमुख विशेषता थी।
प्रश्न :- सविनय अवज्ञा आंदोलन में महिलाओं की क्या भूमिका थी?
उत्तर :- सविनय अवज्ञा आंदोलन में महिलाओं की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण थी। इसकी मुख्य बातें इस प्रकार थीं :-
1. महिलाओं ने बड़ी संख्या में गांधीजी के नमक सत्याग्रह में भाग लिया।
2. यात्रा के दौरान हजारों महिलाएँ गांधीजी की बात सुनने के लिए घरों से बाहर आईं।
3. उन्होंने नमक बनाया, और जलूसों में भाग लिया, विदेशी कपड़ों व शराब की दुकानों की पिकेटिंग की।
4. कई महिलाओं को आंदोलन में भाग लेने के कारण जेल भी जाना पड़ा।
5. ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं ने राष्ट्र सेवा को अपना पवित्र कर्तव्य माना।
नोट :-
सरोजिनी नायडू, कस्तूरबा गांधी और कमला देवी चट्टोपाध्याय जैसी महिलाओं ने सक्रिय भाग लेकर आंदोलन को मजबूत बनाया।
प्रश्न :- सविनय अवज्ञा आंदोलन असहयोग आंदोलन से कैसे भिन्न था?
उत्तर :- सविनय अवज्ञा आंदोलन असहयोग आंदोलन से निम्नलिखित प्रकार से अलग था :-
1. असहयोग आंदोलन का उद्देश्य केवल स्वराज प्राप्त करना था, जबकि सविनय अवज्ञा आंदोलन का लक्ष्य पूर्ण स्वराज था।
2. असहयोग आंदोलन में केवल अंग्रेजी शासन के साथ सहयोग न करने की बात थी, जबकि सविनय अवज्ञा आंदोलन में औपनिवेशिक कानूनों का उल्लंघन भी शामिल था।
उदाहरण :-
असहयोग आंदोलन में विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया था, जबकि सविनय अवज्ञा आंदोलन में नमक कानून तोड़कर प्रत्यक्ष रूप से शासन की अवज्ञा की गई।
प्रश्न :- सविनय अवज्ञा आंदोलन की मुख्य सीमाएँ क्या थीं?
उत्तर :- सविनय अवज्ञा आंदोलन की निम्नलिखित मुख्य सीमाएँ थीं :-
1. अनुसूचित जातियों की भागीदारी बहुत कम थी क्योंकि कांग्रेस लंबे समय से उनके हितों की उपेक्षा करती रही थी।
2. मुस्लिम संगठनों में उत्साह की कमी थी, क्योंकि 1920 के दशक के मध्य में कांग्रेस का झुकाव हिंदू महासभा जैसे संगठनों की ओर बढ़ गया था।
3. हिंदू–मुस्लिम समुदायों के बीच अविश्वास और संदेह का वातावरण बना रहा, जिससे एकता कमजोर पड़ी।
उदाहरण :-
डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अनुसूचित जातियों के हितों की अनदेखी के कारण आंदोलन से दूरी बनाए रखी।
प्रश्न :- 1932 की पूना संधि के मुख्य प्रावधान क्या थे?
उत्तर :- 1932 की पूना संधि के निम्नलिखित मुख्य प्रावधान थे :-
1. दमित वर्गों (जिन्हें बाद में अनुसूचित जाति कहा गया) को प्रांतीय एवं केंद्रीय विधायी परिषदों में आरक्षित सीटें प्रदान की गईं।
2. इन वर्गों के लिए चुनाव सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों में ही कराए जाने का प्रावधान रखा गया।
उदाहरण :-
इस संधि से अनुसूचित जातियों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व का अधिकार तो मिला, परंतु वे अलग निर्वाचन प्रणाली से जुड़ी नहीं थीं।
प्रश्न :- सामूहिक अपनेपन की भावना को जगाने वाले कारक क्या थे?
उत्तर :- भारतीय लोगों में सामूहिक अपनेपन की भावना को जगाने वाले मुख्य कारक निम्नलिखित थे :-
1. चित्र व प्रतीक :- भारत माता की पहली छवि बंकिम चन्द्र द्वारा बनाई गई। इस छवि ने राष्ट्र को पहचानने में मदद दी।
2. लोक कथाएँ :- राष्ट्रवादियों ने इन लोक कथाओं का संकलन किया। ये कथाएँ परंपरागत संस्कृति की सही तस्वीर पेश करती थीं और राष्ट्रीय पहचान तथा अतीत में गौरव का भाव जगाती थीं।
3. चिन्ह :- उदाहरण झंडा। बंगाल में 1905 के स्वदेशी आंदोलन के दौरान सर्वप्रथम एक तिरंगा (हरा, पीला, लाल) जिसमें 8 कमल थे, प्रयोग किया गया। 1921 तक महात्मा गांधी ने सफेद, हरा और लाल रंग का तिरंगा तैयार किया।
4. इतिहास की पुनर्व्याख्या :- भारतीयों ने महसूस किया कि राष्ट्र के प्रति गर्व का भाव जगाने के लिए इतिहास को अलग ढंग से पढ़ाना चाहिए ताकि गर्व का अनुभव हो सके।
5. गीत जैसे वंदे मातरम :- 1870 के दशक में बंकिम चन्द्र ने यह गीत लिखा। मातृभूमि की स्तुति के रूप में यह गीत बंगाल के स्वदेशी आंदोलन में खूब गाया गया।
उदाहरण :-
भारत माता की छवि और वंदे मातरम गीत ने लोगों में राष्ट्र के प्रति प्यार और एकता की भावना को मजबूत किया।