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Class 9 history NOTES IN HINDI CHAPTER 3

Chapter 3: Nazism and the Rise of Hitler
Chapter Introduction: 
This chapter explains the rise of Nazism in Germany and the factors that led to Adolf Hitler’s rise to power. It also discusses the impact of Nazi ideology on society and the world.

FAQ
Ques. Is this chapter important for long-answer questions?
Ans. Yes, questions related to Nazism and Hitler are often asked as descriptive answers.

CLASS 9 HISTORY NOTES IN HINDI
CHAPTER 3 : नात्सीवाद और हिटलर का उदय

प्रश्न :- वाइमर गणराज्य की स्थापना कैसे हुई?

उत्तर :- पहले विश्व युद्ध (1914-1918) में जर्मनी की हार के बाद वहाँ राजशाही का अंत हुआ और एक लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की स्थापना की गई। यही शासन व्यवस्था “वाइमर गणराज्य” के नाम से जानी गई।

वाइमर गणराज्य  के विषय में महत्वपूर्ण तथ्य निम्नलिखित थे :- 

1. प्रथम विश्व युद्ध का परिणाम :- जर्मनी ने ऑस्ट्रिया के साथ मिलकर मित्र राष्ट्रों (इंग्लैंड, फ्रांस और रूस) से युद्ध लड़ा। 1918 में जर्मनी की हार हुई और सम्राट कैसर विल्हेम द्वितीय को गद्दी छोड़नी पड़ी।

2. लोकतांत्रिक सरकार की स्थापना :- 1919 में वाइमर नगर में नेशनल असेंबली की बैठक हुई। इसने संघीय लोकतांत्रिक संविधान बनाया, जिसमें जनता को मतदान का अधिकार दिया गया।

3. वर्साय की संधि (1919) :- मित्र राष्ट्रों ने जर्मनी पर कई कठोर और अपमानजनक शर्तें थोपीं, जैसे :-

(i) जर्मनी को युद्ध का दोषी ठहराया गया।

(ii) लगभग 6 अरब पौंड का जुर्माना लगाया गया।

(iii) उसकी सेना को सीमित कर दिया गया।

(iv) 10% आबादी और 13% भू-भाग अन्य देशों को दे दिया गया।

4. आर्थिक और सामाजिक प्रभाव :-

(i) जर्मनी की अर्थव्यवस्था कमजोर हो गई।

(ii) बेरोजगारी और महंगाई बढ़ गई।

(iii) जनता में असंतोष और बदले की भावना फैल गई।

उदाहरण :-

1923 में जर्मनी में इतनी मुद्रास्फीति हुई कि एक रोटी के लिए लाखों मार्क देने पड़ते थे।

प्रश्न :- वाइमर गणराज्य के सामने कौन-कौन सी प्रमुख समस्याएँ आईं?

उत्तर :- प्रथम विश्व युद्ध के बाद स्थापित वाइमर गणराज्य को शुरुआत से ही निम्नलिखित गंभीर आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा :- 

1. 1919 में हुई वर्साय संधि की कठोर शर्तें :- 

(i) जर्मनी को अपने सभी उपनिवेश, 10% आबादी और 13% भू-भाग छोड़ने पड़े।

(ii) उसके 75% लौह भंडार और 26% कोयला भंडार फ्रांस, पोलैंड, डेनमार्क और लिथुआनिया को दे दिए गए।

(iii) जर्मनी को छह अरब पौंड का जुर्माना भरना पड़ा।

(iv) उसकी सेना भंग कर दी गई और राईनलैंड पर मित्र राष्ट्रों का कब्जा हो गया।

2. आर्थिक संकट :-

(i) युद्ध से ऋण और मुआवजे के बोझ ने जर्मनी की अर्थव्यवस्था को कमजोर कर दिया।

(ii) सोने के भंडार में कमी से मुद्रा का मूल्य गिर गया।

(iii) महंगाई और बेरोजगारी बढ़ गई — आवश्यक वस्तुओं की कीमतें आसमान छूने लगीं।

(iv) 1923 में अत्यधिक मुद्रास्फीति (Hyperinflation) के कारण एक रोटी खरीदने के लिए लाखों मार्क देने पड़ते थे।

3. राजनीतिक संकट :-

(i) वाइमर गणराज्य ने एक नया लोकतांत्रिक संविधान अपनाया, पर उसमें कई कमजोरियाँ थीं।

(ii) आनुपातिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था से स्थिर सरकार नहीं बन पाती थी।

(iii) अनुच्छेद 48 के तहत राष्ट्रपति को आपातकाल में पूर्ण अधिकार मिल जाते थे, जिससे तानाशाही शासन का मार्ग खुल गया।

उदाहरण :-

वाइमर गणराज्य की राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक बदहाली ने जनता का लोकतंत्र से विश्वास उठाया, जिसका फायदा उठाकर एडॉल्फ हिटलर ने सत्ता हासिल की।

प्रश्न :- प्रथम विश्व युद्ध के क्या-क्या प्रभाव पड़े?

उत्तर :- प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) ने यूरोप और विश्व दोनों को गहराई से प्रभावित किया। इसने सामाजिक, राजनीति्क और आर्थिक — तीनों क्षेत्रों में स्थायी परिवर्तन ला दिए।

प्रथम विश्व युद्ध के निम्नलिखित प्रभाव पड़े :-  

1. आर्थिक प्रभाव :- 

(i) युद्ध से पूरे यूरोप की अर्थव्यवस्था तबाह हो गई।

(ii) जो यूरोप पहले कर्ज देने वाला महाद्वीप था, वह अब कर्जदार महाद्वीप बन गया।

(iii) उद्योग-धंधे, परिवहन और व्यापार व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुए।

(iv) लाखों लोग बेरोजगार हो गए और महंगाई बढ़ गई।

2. सामाजिक प्रभाव :-

(i) लाखों सैनिकों और नागरिकों की मौत ने समाज को मानसिक रूप से झकझोर दिया।

(ii) युद्ध के बाद सैनिकों को समाज में अधिक सम्मान मिलने लगा।

(iii) महिलाओं ने युद्धकाल में कारखानों और दफ्तरों में काम किया, जिससे उनकी सामाजिक भूमिका मजबूत हुई।

3. राजनीतिक प्रभाव :-

(i) पुराने राजतंत्री साम्राज्य (जैसे रूस, जर्मनी, ऑस्ट्रिया) समाप्त हो गए।

(ii) नई लोकतांत्रिक सरकारें बनीं जैसे – वाइमर गणराज्य (जर्मनी)

(iii) राष्ट्रवाद और सैन्यवाद का प्रभाव बढ़ा।

4. मनोवैज्ञानिक प्रभाव :-

(i) लोगों के मन में भय, असुरक्षा और आक्रोश भर गया।

(ii) नेताओं और प्रचारकों ने “आक्रामक और मर्दाना पुरुषत्व” को गौरव का प्रतीक बताना शुरू किया।

उदाहरण :-
प्रथम विश्व युद्ध के बाद जर्मनी और इटली में असंतोष इतना बढ़ा कि हिटलर और मुसोलिनी जैसे तानाशाहों का उदय हुआ।

प्रश्न :- राजनीतिक रैडिकलवाद और 1923 के आर्थिक संकट का क्या संबंध था?

उत्तर :- 1923 में जर्मनी में आया भयानक आर्थिक संकट केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि राजनीतिक अस्थिरता और रैडिकलवादी विचारों को भी जन्म देने वाला था।

इस विषय में महत्वपूर्ण तथ्य निम्नलिखित थे :- 

1. युद्धोत्तर आर्थिक बोझ :- 

(i) जर्मनी ने प्रथम विश्व युद्ध भारी कर्ज लेकर लड़ा था।

(ii) युद्ध के बाद उसे वर्साय संधि के तहत स्वर्ण मुद्रा में हर्जाना भरना पड़ा।

(iii) इस दोहरे बोझ से देश का स्वर्ण भंडार लगभग समाप्त हो गया।

2. हर्जाना चुकाने से इंकार :-

(i) आर्थिक तंगी के कारण 1923 में जर्मनी ने कर्ज और हर्जाना चुकाने से इंकार कर दिया।

(ii) फ्रांस ने इसका जवाब देते हुए रूर क्षेत्र (कोयला भंडार वाला इलाका) पर कब्जा कर लिया।

3. मुद्रा संकट :-

(i) रूर पर कब्जे से उद्योग ठप हो गए।

(ii) सरकार ने खर्च चलाने के लिए बड़ी मात्रा में मुद्रा छापनी शुरू कर दी।

(iii) परिणामस्वरूप मुद्रा (मार्क) का मूल्य गिरता गया।

(iv) अप्रैल 1923: 1 डॉलर = 24,000 मार्क

(v) जुलाई 1923: 1 डॉलर = 3,53,000 मार्क

(vi) अगस्त 1923: 1 डॉलर = 46,21,000 मार्क

(vii) दिसंबर 1923: 1 डॉलर = 9,88,60,000 मार्क

4. राजनीतिक रैडिकलवाद का उभार :-

(i) मुद्रा संकट से जनता भुखमरी, बेरोजगारी और असंतोष से भर गई।

(ii) लोगों का लोकतांत्रिक सरकार पर विश्वास कम हो गया।

(iii) इस स्थिति का फायदा कट्टरवादी दलों (रैडिकल पार्टियों) ने उठाया, जैसे — नाज़ी पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी।

उदाहरण :- 1923 के इसी संकट के दौरान हिटलर ने म्यूनिख में विद्रोह (Beer Hall Putsch) करने की कोशिश की थी, जिससे उसके विचारों को लोकप्रियता मिली।

प्रश्न :- अति-मुद्रास्फीति (Hyperinflation) क्या होती है और यह जर्मनी में कैसे हुई?

उत्तर :- अति-मुद्रास्फीति :- ऐसी स्थिति है जब वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें बहुत तेज़ी से बढ़ने लगती हैं और मुद्रा का मूल्य लगभग खत्म हो जाता है।

जर्मनी में मुद्रा स्फीती के निम्नलिखित परिणाम हुए :- 

1. जर्मनी में स्थिति :- प्रथम विश्व युद्ध के बाद जर्मनी को भारी युद्ध क्षतिपूर्ति (हर्जाना) देना पड़ा। सरकार ने हर्जाना और खर्च पूरा करने के लिए बहुत अधिक मात्रा में नोट छापे। जैसे-जैसे नोट बढ़े, मार्क का मूल्य घटता गया।
2. कीमतों में बेतहाशा वृद्धि :- मार्क की कीमत गिरने से आवश्यक वस्तुओं की कीमतें आसमान छूने लगीं। लोग नोटों से भरे थैले लेकर रोटी खरीदने जाते थे, क्योंकि मुद्रा का मूल्य कुछ नहीं रह गया था।

3. सामाजिक प्रभाव :- मध्यम वर्ग और मजदूर वर्ग भयंकर रूप से प्रभावित हुए। बचत का मूल्य खत्म हो गया और गरीबी तथा असंतोष बढ़ गया। जर्मन समाज दुनिया भर में हमदर्दी का पात्र बन गया।
उदाहरण :- 

1923 में 1 अमेरिकी डॉलर की कीमत 9,88,60,000 जर्मन मार्क तक पहुँच गई — यह इतिहास की सबसे बड़ी अति-मुद्रास्फीति में से एक थी।

नोट :-

अति-मुद्रास्फीति ने जर्मनी की आर्थिक रीढ़ तोड़ दी, जिससे लोगों में असंतोष फैला और आगे चलकर राजनीतिक अस्थिरता और नाज़ीवाद के उभार का मार्ग प्रशस्त हुआ।

प्रश्न :- जर्मनी में “मंदी के साल” (1929 की आर्थिक महामंदी) के क्या प्रभाव पड़े?

उत्तर :- जर्मनी में “मंदी के साल” (1929 की आर्थिक महामंदी) के निम्नलिखित  प्रभाव पड़े?

1. आर्थिक निर्भरता :- जर्मनी की औद्योगिक प्रगति अमेरिका से लिए गए अल्पकालिक ऋणों पर निर्भर थी। जब अमेरिकी शेयर बाजार गिरा, तो अमेरिका ने अपने कर्ज वापस माँग लिए।

2. उद्योग और व्यापार पर प्रभाव :- फैक्ट्रियाँ बंद हो गईं और उत्पादन ठप पड़ गया। निर्यात तेजी से घट गया, जिससे विदेशी व्यापार बुरी तरह प्रभावित हुआ।

3. कृषि पर प्रभाव :- किसानों की फसलें बिकनी बंद हो गईं। ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी और बेरोजगारी बढ़ी।

4. बेरोजगारी में वृद्धि :- लाखों मजदूरों ने अपनी नौकरियाँ खो दीं। बेरोजगारों की संख्या 60 लाख तक पहुँच गई। मजदूरों के वेतन भी बहुत कम कर दिए गए।

5. सामाजिक प्रभाव :- लोगों में असंतोष और भय का माहौल फैल गया। मध्यम वर्ग की बचत खत्म हो गई, और जनता सरकार से निराश हो गई।

उदाहरण :- 

1929 की “ब्लैक थर्सडे” (24 अक्टूबर) को केवल एक दिन में 1.3 करोड़ शेयर बेच दिए गए — यहीं से आर्थिक महामंदी की शुरुआत हुई।

प्रश्न :- नात्सीवाद क्या है और इसका जनक किसे माना जाता है?

उत्तर :- नात्सीवाद :- एक राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक विचारधारा है जो जर्मनी में फैली एक सम्पूर्ण व्यवस्था के रूप में जानी जाती है।  जो राष्ट्र की शक्ति, जातीय श्रेष्ठता और तानाशाही शासन पर आधारित थी। इस विचारधारा का जनक एडॉल्फ हिटलर को माना जाता है।

प्रश्न :- नाजियों का विश्व दृष्टिकोण क्या था?

उत्तर :- नाजियों का विश्व दृष्टिकोण एक ऐसी सोच पर आधारित था जिसमें जातीय श्रेष्ठता, आक्रामक राष्ट्रवाद और तानाशाही शासन को सर्वोच्च माना गया।

इस विषय में महत्वपूर्ण तथ्य निम्नलिखित थे :- 

1. राष्ट्रीय समाजवाद का उदय :-  नाजियों ने अपने विचारों को राष्ट्रीय समाजवाद (National Socialism) कहा, जिसमें व्यक्ति से अधिक राष्ट्र को महत्व दिया गया।
2. सक्षम नेतृत्व में विश्वास :-  वे मानते थे कि देश को एक सशक्त और निर्णायक नेता की आवश्यकता है — और यह भूमिका हिटलर ने निभाई।

3. नस्ली कल्पनालोक (यूजोपिया) :-  नाजियों का सपना था एक ऐसा समाज बनाना जिसमें केवल शुद्ध आर्य नस्ल के लोग रहें और अन्य नस्लों को नष्ट या अलग कर दिया जाए।

4. जीवन परिधि (लेबेन्सत्राउम) :-  नाजियों का मानना था कि जर्मन लोगों को बसाने और बढ़ाने के लिए नए इलाकों पर कब्जा करना जरूरी है। इसके लिए उन्होंने पड़ोसी देशों पर आक्रमण किया।

5. नस्लीय श्रेष्ठता की धारणा :-  उनका विश्वास था कि केवल नॉर्डिक आर्य जाति श्रेष्ठ है और यहूदी, स्लाव तथा अश्वेत जातियाँ नीच और अपवित्र हैं।

उदाहरण :- 

हिटलर ने “आर्य राष्ट्र” के निर्माण के लिए यहूदियों, जिप्सियों और अन्य जातियों पर अत्याचार किए — जिसे इतिहास में होलोकॉस्ट के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न :- जर्मनी में हिटलर के उदय के क्या कारण थे?

उत्तर :- प्रथम विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी की स्थिति बहुत खराब थी, जिसका फायदा उठाकर हिटलर ने जनता का विश्वास जीत लिया। हिटलर के उदय के पीछे निम्नलिखित राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक कारण थे :-  

1. वर्साय की संधि की कठोर शर्तें :- इस संधि ने जर्मनी को आर्थिक, सैन्य और मानसिक रूप से तोड़ दिया।  देश की जनता हताश हो गई और बदले की भावना से भर उठी।

2. वाइमर गणराज्य की कमजोरियाँ :-  लोकतांत्रिक सरकार स्थिरता नहीं ला पाई। अनुच्छेद 48 जैसी कमजोरियों ने तानाशाही के लिए रास्ता खोला।

3. आमूल परिवर्तनवादियों और समाजवादियों में फूट :-  दोनों गुट आपस में एकजुट नहीं रहे, जिससे विपक्ष कमजोर पड़ा। हिटलर ने इसका फायदा उठाकर सत्ता पर कब्जा किया।

4. नात्सी प्रचार (प्रोपेगेंडा) :-  नाजी पार्टी ने अख़बारों, रेडियो और भाषणों के ज़रिए जनता को यह समझाया कि केवल हिटलर ही जर्मनी की गरिमा लौटा सकता है।

5. सर्वघटाकारण (कम्युनिज़्म) का भय :-  समाज के उच्च वर्ग और उद्योगपति कम्युनिस्ट शासन से डरते थे।
उन्होंने हिटलर को एक “रक्षक” के रूप में देखा।

6. बेरोजगारी और आर्थिक मंदी :- 1929 की महामंदी से लाखों लोग बेरोजगार हो गए।  हिटलर ने रोजगार और आर्थिक स्थिरता का वादा किया।

उदाहरण :-

1933 में हिटलर को जर्मनी का चांसलर नियुक्त किया गया, और जल्द ही उसने लोकतंत्र को खत्म कर तानाशाही शासन स्थापित कर दिया।

प्रश्न :- हिटलर का उदय कैसे हुआ?

उत्तर :- हिटलर का उदय प्रथम विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक अस्थिरता का परिणाम था। उसने जनता को बेहतर भविष्य का सपना दिखाकर सत्ता हासिल की।

इस विषय में महत्वपूर्ण तथ्य निम्नलिखित प्रकार से हुआ :- 

1. वर्कर्स पार्टी में शामिल होना :-  1919 में हिटलर ने जर्मन वर्कर्स पार्टी की सदस्यता ली।  धीरे-धीरे उसने इस संगठन पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया।

2. नात्सी पार्टी का गठन :- हिटलर ने पार्टी का नाम बदलकर नेशनल सोशलिस्ट जर्मन वर्कर्स पार्टी (नात्सी पार्टी) रख दिया।  यह पार्टी आगे चलकर जर्मनी की सबसे प्रभावशाली पार्टी बन गई।

3. महामंदी का प्रभाव :-  1929 की महामंदी से जर्मन अर्थव्यवस्था बुरी तरह टूट गई। कारखाने बंद हो गए, मजदूर बेरोजगार हो गए और जनता भुखमरी का शिकार हो गई।

4. नात्सी प्रचार (प्रोपेगेंडा) :-  नात्सियों ने अखबारों, भाषणों और नारों के माध्यम से लोगों में विश्वास जगाया कि वे जर्मनी का गौरव फिर से लौटा सकते हैं। उन्होंने जर्मन जनता को “बेहतर भविष्य” का सपना दिखाया।

5. चुनाव में सफलता :-  जनता की निराशा का फायदा उठाकर नात्सी पार्टी ने 1932 के चुनावों में 32% वोट हासिल किए।  इसके बाद 1933 में हिटलर जर्मनी का चांसलर बना।

उदाहरण :-

हिटलर ने सत्ता में आने के बाद वाइमर गणराज्य को समाप्त कर तानाशाही शासन स्थापित किया और जर्मनी को नात्सी विचारधारा की ओर मोड़ दिया।

प्रश्न :- हिटलर की राजनीतिक शैली कैसी थी?

उत्तर :- हिटलर की राजनीतिक शैली पूरी तरह नाटकीय और प्रचार-प्रधान थी। वह जनता को प्रभावित करने के लिए आडंबर, प्रदर्शन और भावनात्मक नारों का प्रयोग करता था।

हिटलर की राजनीतिक शैली निम्नलिखित थी :-

1. आडंबर और प्रदर्शन :-  हिटलर को भव्य रैलियाँ और सभाएँ आयोजित करना पसंद था।
वह इन्हीं के माध्यम से जनता में एकता और निष्ठा की भावना जगाता था।

2. नात्सी प्रतीकों का प्रयोग :-  रैलियों में स्वस्तिक छपे लाल झंडे, नात्सी सैल्यूट और विशेष नारे प्रयोग किए जाते थे।  ये प्रतीक जनता में राष्ट्रवाद की भावना को बढ़ाते थे।

3. प्रभावशाली भाषण :-  हिटलर अपने जोशीले और भावनात्मक भाषणों से लोगों को आकर्षित करता था।
उसके बोलने का तरीका जनता को उत्साहित कर देता था।

4. नात्सी अनुशासन :- उसके भाषणों के बाद नात्सी सदस्य खास अंदाज में तालियाँ बजाकर उसे समर्थन जताते थे। इससे जनता को संगठित और शक्तिशाली होने का अहसास होता था।

5. स्वयं को रक्षक के रूप में प्रस्तुत करना :- आर्थिक और राजनीतिक संकट के समय हिटलर ने खुद को जर्मनी का मसीहा बताकर प्रचारित किया। जैसे वह देश को तबाही से उबारने के लिए ही आया हो।

उदाहरण :-

नात्सी सभाओं में हिटलर की मौजूदगी को एक धार्मिक अनुष्ठान की तरह पेश किया जाता था, जिससे जनता में उसके प्रति अंधभक्ति बढ़ी।

प्रश्न :- जर्मनी में नात्सीवाद को लोकप्रियता कैसे मिली?

उत्तर :- नात्सीवाद को जर्मनी में लोकप्रियता मुख्य रूप से आर्थिक संकट, बेरोजगारी, वर्साय संधि की नाइंसाफी और हिटलर के शक्तिशाली नेतृत्व के कारण मिली। उसने जनता को एक बेहतर भविष्य का सपना दिखाया।

जर्मनी में नात्सीवाद को लोकप्रियता निम्नलिखित कारणों से मिली :- 

1. आर्थिक संकट :- 1929 की महामंदी के बाद बैंक दिवालिया हो गए, फैक्ट्रियाँ बंद हो गईं, और मजदूर बेरोजगार हो गए। जनता में भुखमरी और असुरक्षा की भावना बढ़ी।

2. मध्यवर्ग की लाचारी :-  मध्यवर्ग को आर्थिक गिरावट का सबसे ज्यादा असर झेलना पड़ा। नात्सीवाद ने उन्हें स्थिरता और सम्मान का भरोसा दिया।

3. नात्सी प्रचार (प्रोपेगेंडा) :- नात्सियों ने बेहतर भविष्य, राष्ट्रीय गौरव और एकजुटता का संदेश देकर जनता को प्रभावित किया।  रेडियो, पोस्टर और रैलियों के माध्यम से हिटलर को “राष्ट्र रक्षक” के रूप में प्रस्तुत किया गया।

4. हिटलर का नेतृत्व :- हिटलर एक प्रभावशाली वक्ता था। उसके भाषणों ने जनता की भावनाओं को झकझोर दिया। उसने वादा किया कि वह जर्मनी की खोई प्रतिष्ठा वापस लाएगा और विदेशी शक्तियों को जवाब देगा।

5. राष्ट्रवाद का आह्वान :- हिटलर ने जर्मन जनता में राष्ट्रभक्ति और एकता की भावना को जगाया।  उसने वादा किया कि वह बेरोजगारी खत्म करेगा और देश को स्वावलंबी व सशक्त बनाएगा।

उदाहरण :- 

हिटलर की सभाओं में हजारों लोग “एक राष्ट्र, एक नेता, एक आवाज़” के नारे लगाते थे, जिससे जनता में नात्सीवाद के प्रति गहरा विश्वास पैदा हुआ।

प्रश्न :- नात्सियों ने जनता पर पूरा नियंत्रण कैसे स्थापित किया?

उत्तर :- नात्सियों ने जनता पर नियंत्रण करने के लिए प्रचार, प्रदर्शन और डर का माहौल बनाया। उन्होंने लोगों की भावनाओं को उकसाकर हिटलर को “देश का उद्धारकर्ता” बना दिया।

नात्सियों ने जनता पर पूरा नियंत्रण निम्नलिखित प्रकार से किया :- 

1. राजनीतिक शैली और प्रदर्शन :- हिटलर ने राजनीति को एक दृश्य नाटक बना दिया। बड़ी रैलियाँ, जलसे और शक्ति प्रदर्शन के ज़रिए जनता को आकर्षित किया गया।

2. प्रचार तंत्र (Propaganda) :- नात्सी पार्टी ने अखबारों, रेडियो, फिल्मों और पोस्टरों के ज़रिए हिटलर की महानता का प्रचार किया। उसे जनता का “मसीहा” और “राष्ट्र रक्षक” बताया गया।

3. प्रतीक और पहचान :- स्वस्तिक छपे लाल झंडे, नात्सी सैल्यूट और तालियों की विशेष शैली को एकता और शक्ति के प्रतीक के रूप में अपनाया गया।

4. भावनात्मक एकता का निर्माण :- जनसभाओं में लोग एक साथ नारे लगाते थे, जिससे उनमें साझी भावना और अनुशासन पैदा हुआ। इससे हिटलर को एक अविनाशी नेता के रूप में प्रस्तुत किया गया।

5. जनता की कमजोर स्थिति का फायदा :- आर्थिक और राजनीतिक संकट से जूझ रही जनता को नात्सी प्रचार ने आशा और गौरव का सपना दिखाया। इस तरह हिटलर की छवि जनता के बीच उद्धारक (Savior) की बन गई।

उदाहरण :-

नात्सी रैलियों में हजारों लोग एक जैसे झंडे लहराते और “हाइल हिटलर!” के नारे लगाते थे, जिससे जनता को लगता था कि वे एक महान राष्ट्र मिशन का हिस्सा हैं।

प्रश्न :- जर्मनी में लोकतंत्र का ध्वंस कैसे हुआ?

उत्तर :- हिटलर के सत्ता में आने के बाद जर्मनी में लोकतंत्र धीरे-धीरे समाप्त कर दिया गया। उसने अपने विरोधियों को खत्म कर एक तानाशाही शासन (Dictatorship) स्थापित कर दिया।

जर्मनी में लोकतंत्र का ध्वंस निम्नलिखित प्रकार से हुआ :-

1. हिटलर का सत्ता में आना (1933):- 30 जनवरी 1933 को राष्ट्रपति हिंडनबर्ग ने हिटलर को चांसलर बनाया।
यह पद जर्मनी की राजनीति में सबसे शक्तिशाली था।

2. संसद भवन में आग लगना :- फरवरी 1933 में जर्मन संसद राइखस्टाग भवन में रहस्यमय आग लग गई।
हिटलर ने इसका दोष कम्युनिस्टों पर लगाकर उन्हें गिरफ्तार करवा दिया।

3. कम्युनिस्टों पर दमन :- हिटलर ने इस घटना का फायदा उठाकर कम्युनिस्ट पार्टी को पूरी तरह खत्म कर दिया। हजारों कम्युनिस्टों को कंसन्ट्रेशन कैंपों में भेज दिया गया।

4. विशेषाधिकार अधिनियम (Enabling Act), 1933 :-  मार्च 1933 में यह कानून पारित हुआ, जिससे हिटलर को संसद की मंज़ूरी के बिना कानून बनाने का अधिकार मिल गया। यह अधिनियम जर्मनी में तानाशाही शासन की शुरुआत थी।

5. राजनीतिक दलों और यूनियनों पर प्रतिबंध :- नात्सी पार्टी के अलावा सभी राजनीतिक पार्टियों और ट्रेड यूनियनों पर रोक लगा दी गई। अब केवल नात्सी विचारधारा को ही मान्यता दी गई।

6. व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अंत :-  हिटलर को यह अधिकार मिला कि वह किसी को भी बिना मुकदमे के गिरफ्तार, निर्वासित या मार सकता था।

उदाहरण :- 

1933 में हिटलर ने “एक देश, एक नेता, एक पार्टी” का नारा दिया — इसके बाद जर्मनी में कोई विपक्ष या लोकतांत्रिक संस्था नहीं बची।

प्रश्न :- द्वितीय विश्व युद्ध का अंत कैसे हुआ?

उत्तर :- द्वितीय विश्व युद्ध का अंत कई निर्णायक घटनाओं के बाद हुआ, जिनमें अमेरिका का युद्ध में प्रवेश और परमाणु बमों का प्रयोग सबसे प्रमुख थे।

द्वितीय विश्व युद्ध का अंत निम्नलिखित कारणों से हुआ :- 

1. अमेरिका का युद्ध में प्रवेश :- 1941 में जापान ने अमेरिका के पर्ल हार्बर पर हमला किया। इसके बाद अमेरिका ने मित्र राष्ट्रों (ब्रिटेन, फ्रांस, रूस) की ओर से युद्ध में भाग लिया।

2. धुरी राष्ट्रों की हार :- अमेरिका, ब्रिटेन और सोवियत संघ की संयुक्त शक्ति के आगे जर्मनी, इटली और जापान टिक नहीं पाए। 1945 तक जर्मनी और इटली पूरी तरह पराजित हो गए।

3. हिटलर की पराजय और आत्महत्या :- अप्रैल 1945 में सोवियत सेना ने बर्लिन पर कब्जा कर लिया। हिटलर ने आत्महत्या कर ली, जिससे नात्सी शासन का अंत हुआ।

4. जापान पर परमाणु बम हमला :- अगस्त 1945 में अमेरिका ने हिरोशिमा और नागासाकी शहरों पर परमाणु बम गिराए। इन हमलों में लाखों लोग मारे गए और जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया।

5. युद्ध का अंत :- जापान के आत्मसमर्पण के साथ ही 2 सितंबर 1945 को द्वितीय विश्व युद्ध का औपचारिक रूप से अंत हुआ।

उदाहरण :- 

6 अगस्त 1945 को हिरोशिमा और 9 अगस्त 1945 को नागासाकी पर परमाणु बम गिराए गए, जिसके बाद जापान ने 15 अगस्त को आत्मसमर्पण की घोषणा की।

प्रश्न :- नात्सी जर्मनी में युवाओं की स्थिति कैसी थी?

उत्तर :- नात्सी शासन के दौरान युवाओं को पूरी तरह से हिटलर और नात्सी विचारधारा के अनुसार ढालने की कोशिश की गई। शिक्षा, खेल, संगठन — सबका उद्देश्य एक “नस्लीय रूप से शुद्ध और आज्ञाकारी नागरिक” बनाना था।

नात्सी जर्मनी में युवाओं की स्थिति निम्नलिखित थी :- 

1. शिक्षा में भेदभाव :- जर्मन और यहूदी बच्चे एक साथ नहीं पढ़ सकते थे। यहूदी, जिप्सी और शारीरिक रूप से अक्षम बच्चों को स्कूलों से निकाल दिया गया।

2. पाठ्यपुस्तकों में बदलाव :- स्कूली पुस्तकों को दोबारा लिखा गया ताकि नस्लीय भेदभाव और हिटलर की श्रेष्ठता का प्रचार किया जा सके। बच्चों को सिखाया जाता था कि आर्य जाति सबसे श्रेष्ठ है।

3. युवा संगठन :- 10 वर्ष की उम्र में बच्चों को “युंगफोल्क (Jungvolk)” संगठन में शामिल किया जाता था। 14 वर्ष की उम्र में सभी लड़कों के लिए “हिटलर यूथ (Hitler Youth)” की सदस्यता अनिवार्य थी।

4. लड़कियों की शिक्षा :- लड़कियों को घर-परिवार, बच्चों की देखभाल और मातृत्व पर केंद्रित शिक्षा दी जाती थी ताकि वे “आर्य नस्ल” को आगे बढ़ा सकें।

उदाहरण :-

हर जर्मन लड़के को हिटलर यूथ शिविरों में शारीरिक प्रशिक्षण दिया जाता था, जहाँ उन्हें अनुशासन, हथियार चलाना और देश के प्रति अंध निष्ठा सिखाई जाती थी।

प्रश्न :- नात्सी जर्मनी में महिलाओं की स्थिति कैसी थी?

उत्तर :- नात्सी शासन में महिलाओं की भूमिका को घर और मातृत्व तक सीमित कर दिया गया। उन्हें पुरुषों के समान अधिकार नहीं दिए गए बल्कि “आर्य नस्ल” को आगे बढ़ाने का माध्यम माना गया।

नात्सी जर्मनी में महिलाओं की स्थिति निम्नलिखित थी :-

1. महिलाओं की भूमिका :- लड़कियों को यह सिखाया जाता था कि उनका मुख्य कर्तव्य एक अच्छी माँ बनना और शुद्ध रक्त वाले बच्चों को जन्म देना है। उन्हें यहूदियों और अन्य अवांछित नस्लों से दूर रहने का आदेश दिया गया।

2. शिक्षा और प्रशिक्षण :- महिलाओं की शिक्षा को सीमित कर दिया गया। उन्हें गृहकार्य, बच्चों की देखभाल और नात्सी मूल्य मान्यताओं की शिक्षा देने के लिए तैयार किया जाता था।

3. हिटलर का दृष्टिकोण :- हिटलर ने 1933 में कहा — “मेरे राज्य की सबसे महत्वपूर्ण नागरिक माँ है।” मातृत्व को महिलाओं के लिए सर्वोच्च सम्मान माना गया।

4. पुरस्कार और दंड :- अधिक बच्चे पैदा करने वाली माताओं को सरकार द्वारा कांस्य, रजत और स्वर्ण पदक दिए जाते थे। नस्ली तौर पर अवांछित बच्चों को जन्म देने वाली माताओं को दंडित और अपमानित किया जाता था — जैसे सिर मुंडवा देना, मुँह पर कालिख पोतना और समाज में घुमाना।

5. सुविधाएँ :-  योग्य माताओं को अस्पतालों में विशेष सुविधाएँ, दुकानों में छूट, तथा रेल और थिएटर टिकटों पर रियायतें दी जाती थीं।

उदाहरण :- 

एक “आर्यन” महिला जो चार या उससे अधिक बच्चे पैदा करती थी, उसे “मदर क्रॉस” (Mother’s Cross) से सम्मानित किया जाता था — यह नात्सी शासन में मातृत्व को गौरवपूर्ण दिखाने का प्रतीक था।

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