Class 9 history NOTES IN HINDI CHAPTER 2
CLASS 9 HISTORY NOTES IN HINDI
CHAPTER 2 : यूरोप में समाजवाद एवं रुसी क्रांति
प्रश्न :- सामाजिक परिवर्तन का युग किसे कहा जाता है और इसकी प्रमुख विचारधाराएँ कौन-सी थीं?
उत्तर :- सामाजिक परिवर्तन का युग :- यह वह समय था जब समाज में तेज़ी से सामाजिक और आर्थिक बदलाव हो रहे थे। औद्योगिक क्रांति के कारण लोगों के जीवन में निम्नलिखित समस्याएँ उत्पन्न हुईं जैसे :–
(i) काम की लंबी अवधि,
(ii) कम मजदूरी,
(iii) बेरोजगारी,
(iv) आवास की कमी,
(v) साफ-सफाई की कमजोर व्यवस्था।
इन परिस्थितियों ने लोगों को नई सामाजिक व्यवस्था और सुधारों पर विचार करने के लिए प्रेरित किया।
फ्रांसीसी क्रांति ने समाज में परिवर्तन की संभावनाओं के द्वार खोल दिए, जिससे लोगों में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के विचार फैलने लगे।
इस दौरान निम्नलिखित तीन प्रमुख विचारधाराओं का विकास हुआ :-
1. उदारवादी (Liberal): स्वतंत्रता और समान अधिकारों के समर्थक।
2. रूढ़िवादी (Conservative): पुराने सामाजिक मूल्यों को बनाए रखने वाले।
3. परिवर्तनवादी (Radical): समाज में तेज़ और गहरे सुधार के समर्थक।
उदाहरण :-
उदारवादियों ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता का समर्थन किया, जबकि परिवर्तनवादियों ने समानता स्थापित करने के लिए क्रांतिकारी बदलावों की वकालत की।
प्रश्न :- उदारवादी किसे कहा जाता है?
उत्तर :- उदारवाद (Liberalism) :- एक ऐसी विचारधारा है जो व्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता और अधिकारों की रक्षा का समर्थन करती है।
प्रश्न :- उदारवादियों के मुख्य विचार क्या थे?
उत्तर :- उदारवादियों के मुख्य विचार निम्नलिखित थे :-
1. अनियंत्रित सत्ता के विरोधी :- उदारवादी राजा या शासक की निरंकुश सत्ता के खिलाफ थे। वे मानते थे कि सत्ता को संविधान और कानून द्वारा नियंत्रित किया जाना चाहिए।
2. सभी धर्मों का आदर एवं सम्मान :- उदारवादी यह चाहते थे कि राज्य किसी एक धर्म को विशेष महत्व न दे, बल्कि सभी धर्मों के लोगों को बराबर का सम्मान और अधिकार मिले।
3. व्यक्ति मात्र के अधिकारों की रक्षा :- वे मानते थे कि हर व्यक्ति को स्वतंत्रता, संपत्ति और अभिव्यक्ति का अधिकार मिलना चाहिए।
4. प्रतिनिधित्व पर आधारित सरकार :- उदारवादी प्रतिनिधियों द्वारा चुनी गई सरकार के पक्ष में थे, जहाँ जनता की राय शासन में शामिल हो।
5. सीमित मताधिकार का समर्थन :- वे सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार (Universal Adult Franchise) के विरोधी थे, और केवल संपत्ति रखने वाले नागरिकों को वोट देने का अधिकार देने के पक्षधर थे।
उदाहरण :-
19वीं सदी में यूरोप के उदारवादी नेताओं ने संविधान, संसद और संपत्तिधारी मतदाताओं वाली शासन प्रणाली की स्थापना की मांग की।
प्रश्न :- रूढ़िवादी किसे कहते हैं?
उत्तर :- रूढ़िवादी :- वह लोग होते हैं जो पुरानी परंपराओं और मान्यताओं में विश्वास करते हैं। वे समाज में तेज़ बदलावों के विरोधी होते हैं और पुराने ढाँचे को बनाए रखना चाहते हैं।
प्रश्न :- रूढ़िवादियों के मुख्य विचार क्या थे?
उत्तर :- रूढ़िवादियों के मुख्य विचार निम्नलिखित थे :-
1. उदारवादियों और परिवर्तनवादियों का विरोध :- रूढ़िवादी तेज़ सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तनों के खिलाफ थे तथा उदारवादी और परिवर्तनवादी विचारों का विरोध करते थे।
2. अतीत का सम्मान :- वे पुराने रीति-रिवाजों, परंपराओं और सामाजिक व्यवस्थाओं को सम्मान देते थे तथा उन्हें समाज की स्थिरता का आधार मानते थे।
3. बदलाव की प्रक्रिया धीमी हो :- रूढ़िवादी मानते थे कि परिवर्तन अचानक नहीं, बल्कि धीरे-धीरे होना चाहिए ताकि समाज में अस्थिरता न आए।
उदाहरण :-
1815 के बाद यूरोप के शासकों ने पुराने राजतंत्र और सामाजिक व्यवस्था को फिर से स्थापित किया — यह रूढ़िवादी सोच का परिणाम था।
प्रश्न :- परिवर्तनवादी किसे कहते हैं?
उत्तर :- परिवर्तनवादी :- वह विचारधारा है जो समाज और राजनीति में क्रांतिकारी परिवर्तन लाना चाहती है।
प्रश्न :- परिवर्तनवादियों के मुख्य विचार क्या थे?
उत्तर :- परिवर्तनवादियों ने समाज में समानता और न्याय स्थापित करने के लिए निम्नलिखित मुख्य विचार प्रस्तुत किए।
1. बहुमत आधारित सरकार के पक्षधर :- परिवर्तनवादी जनता की भागीदारी वाली सरकार चाहते थे जो बहुमत के आधार पर चुनी जाए।
2. विशेषाधिकारों का विरोध :- वे बड़े जमींदारों और सम्पन्न उद्योगपतियों को मिले जन्मना विशेषाधिकारों के खिलाफ थे।
3. सम्पत्ति के संकेद्रण का विरोध :- परिवर्तनवादी मानते थे कि सम्पत्ति कुछ लोगों के हाथों में सीमित नहीं रहनी चाहिए, परंतु वे निजी सम्पत्ति के विरोधी नहीं थे।
4. महिला मताधिकार आंदोलन का समर्थन :- उन्होंने महिलाओं को भी मतदान और समान अधिकार मिलने का समर्थन किया।
उदाहरण :-
यूरोप में समाजवादी और मार्क्सवादी आंदोलनों ने परिवर्तनवादी विचारों को आगे बढ़ाया।
प्रश्न :- समाजवादी विचारधारा क्या है?
उत्तर :- समाजवादी :- विचारधारा एक ऐसी विचारधारा है जो समाज में समानता, न्याय और संतुलन स्थापित करने पर बल देती है।
प्रश्न :- समाजवादियों के मुख्य विचार क्या थे?
उत्तर :- समाजवादियों के विचार समाज में समानता, न्याय और सामूहिक स्वामित्व पर आधारित थे जो कि निम्नलिखित है :-
1. निजी सम्पत्ति का विरोध :- समाजवादी मानते थे कि निजी सम्पत्ति असमानता और शोषण का कारण है।
2. सामूहिक समुदायों की रचना :- रॉबर्ट ओवेन ने ऐसे समुदाय बनाने पर जोर दिया जहाँ सभी लोग मिलजुलकर कार्य करें और लाभ समान रूप से बाँटा जाए।
3. सरकार द्वारा सामूहिक उद्यमों को बढ़ावा :- लुई ब्लॉक ने सुझाव दिया कि सरकार को सामूहिक उत्पादन और उद्यमों को प्रोत्साहित करना चाहिए।
4. संपत्ति पर समाज का नियंत्रण :- कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स का विचार था कि सारी संपत्ति और उत्पादन के साधनों पर पूरे समाज का नियंत्रण और स्वामित्व होना चाहिए।
उदाहरण :-
कार्ल मार्क्स की पुस्तक “दास कैपिटल” समाजवादी विचारधारा का प्रमुख ग्रंथ है।
प्रश्न :- औद्योगिक समाज और सामाजिक परिवर्तन में क्या संबंध है? समझाईए।
उत्तर :- औद्योगिक समाज वह समय था जब मशीनों और फैक्ट्रियों के कारण लोगों के जीवन में बड़े सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन आए।
औद्योगिक समाज और सामाजिक परिवर्तन में क्या संबंध :-
1. नए शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों का विकास :- इस दौर में नए शहर बसने लगे और अनेक औद्योगिक क्षेत्र विकसित हुए।
2. रेलवे का विस्तार :- रेलमार्गों के फैलाव से उद्योगों और व्यापार में तेजी आई।
3. कारखानों में काम की स्थिति :- पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को कारखानों में लंबे समय तक काम करना पड़ता था, परंतु मजदूरी बहुत कम मिलती थी।
4. बेरोजगारी की समस्या :- काम के अवसर सीमित होने के कारण बेरोजगारी आम समस्या बन गई थी।
5. शहरों की गंदगी और आवास की कमी :- तेजी से बढ़ते शहरों में रहने और सफाई की व्यवस्था बिगड़ती जा रही थी।
6. उदारवादी और रैडिकलों के प्रयास :- इन कठिनाइयों का समाधान खोजने के लिए उदारवादी और रैडिकल विचारधारा के लोग प्रयास कर रहे थे।
उदाहरण :-
औद्योगिक क्रांति के बाद इंग्लैंड के मैनचेस्टर और लंदन जैसे शहरों में तेजी से औद्योगिक और सामाजिक परिवर्तन हुए।
प्रश्न :- यूरोप में समाजवाद का उदय कैसे हुआ?
उत्तर :- यूरोप में समाजवाद का उदय :- औद्योगिक क्रांति के बाद जब समाज में अमीर और गरीब के बीच गहरी असमानता बढ़ गई समाजवादियों ने इस असमानता को दूर करने के लिए नई विचारधारा प्रस्तुत की। तब यूरोप में समाजवाद का उदय हुआ जिसके निम्नलिखित कारण थे :-
1. निजी संपत्ति का विरोध :- समाजवादी मानते थे कि संपत्ति पर निजी स्वामित्व अन्यायपूर्ण है, क्योंकि इसका लाभ केवल कुछ लोगों को ही मिलता है।
2. श्रमिकों के शोषण की समस्या :- अमीर लोग मजदूरों से काम तो करवाते थे, परंतु उनके हितों की परवाह नहीं करते थे।
3. संपत्ति पर सामूहिक नियंत्रण की वकालत :- समाजवादियों का कहना था कि यदि संपत्ति पर पूरे समाज का नियंत्रण हो, तो सभी के हितों का ध्यान बेहतर ढंग से रखा जा सकता है।
4. कार्ल मार्क्स का योगदान :- कार्ल मार्क्स ने कहा कि मजदूरों को पूंजीवादी शोषण से मुक्त कराने के लिए एक नया समाज बनाना होगा। उन्होंने इस नए समाज को साम्यवादी (कम्युनिस्ट) समाज का नाम दिया।
उदाहरण :-
कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स ने “कम्युनिस्ट घोषणापत्र” (1848) में समाजवाद और मजदूरों के अधिकारों की बात रखी।
प्रश्न :- यूरोप में समाजवाद को समर्थन कैसे मिला?
उत्तर :- 19वीं शताब्दी के अंत तक समाजवाद पूरे यूरोप में एक प्रभावशाली विचारधारा बन गया। मजदूरों ने अपने अधिकारों के लिए संगठित होना शुरू किया और समाजवादी दलों का गठन किया गया।
यूरोप में समाजवाद को समर्थन मिलने के निम्नलिखित कारण थे :-
1. समाजवादी विचारों का प्रसार :- 1870 के दशक तक समाजवादी विचार पूरे यूरोप में फैल चुके थे।
2. अंतरराष्ट्रीय संगठन की स्थापना :- समाजवादियों ने अपने विचारों के प्रचार और एकजुटता के लिए ‘द्वितीय इंटरनेशनल’ नाम से एक अंतरराष्ट्रीय संस्था बनाई।
3. मजदूर संगठनों का गठन :- इंग्लैंड और जर्मनी के मजदूरों ने अपनी जीवन और कार्य परिस्थितियों को सुधारने के लिए संगठन बनाए।
4. मजदूर अधिकारों की मांग :- समाजवादियों ने काम के घंटे घटाने और मताधिकार की मांग उठाई।
5. राजनीतिक दलों का निर्माण :- ब्रिटेन (1905) में समाजवादियों और ट्रेड यूनियन आंदोलनकारियों ने मिलकर लेबर पार्टी की स्थापना की। फ्रांस में भी इसी प्रकार की एक पार्टी सोशलिस्ट पार्टी के नाम से गठित हुई।
उदाहरण :-
ब्रिटेन की लेबर पार्टी और फ्रांस की सोशलिस्ट पार्टी ने मजदूरों के अधिकारों और समाज में समानता के लिए राजनीतिक संघर्ष किया।
प्रश्न :- रूसी क्रांति किसे कहते हैं?
उत्तर :- रूसी क्रांति :- उन घटनाओं की श्रृंखला को कहा जाता है जो फरवरी 1917 से अक्टूबर 1917 के बीच रूस में हुईं।
वे घटनाएँ निम्नलिखित है :-
1. फरवरी 1917 में राजशाही (जार शासन) का पतन हुआ।
2. अक्टूबर 1917 में समाजवादियों (बोल्शेविकों) ने रूस की सत्ता पर कब्जा कर लिया।
इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि, राजशाही से समाजवादी शासन तक के परिवर्तन को ही रूसी क्रांति कहा जाता है।
उदाहरण :-
1917 की रूसी क्रांति के परिणामस्वरूप जार निकोलस द्वितीय का शासन समाप्त हुआ और लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविकों की सरकार बनी।
प्रश्न :- 1914 में रूसी समाज की स्थिति कैसी थी?
उत्तर :- 1914 में रूस पर जार निकोलस द्वितीय का शासन था। रूस का साम्राज्य बहुत विशाल था और उसमें अनेक देश एवं क्षेत्र शामिल थे। मास्को के आसपास के क्षेत्रों के अलावा, आज के फिनलैंड, लातविया, लिथुआनिया, पोलैंड, यूक्रेन, तथा बेलारूस के कुछ हिस्से भी रूसी साम्राज्य के अंग थे।
उदाहरण :-
1914 में रूस का साम्राज्य इतना बड़ा था कि वह यूरोप और एशिया — दोनों महाद्वीपों में फैला हुआ था, और विभिन्न जातियों व भाषाओं के लोग वहाँ रहते थे।
प्रश्न :- बीसवीं सदी की शुरुआत में रूसी समाज की अर्थव्यवस्था कैसी थी?
उत्तर :- बीसवीं सदी की शुरुआत में रूसी समाज की अर्थव्यवस्था निम्नलिखित अवस्था में थी :-
1. कृषि पर निर्भरता :- रूस की लगभग 85% जनता खेती पर निर्भर थी।
2. उद्योगों की स्थिति :- कारखाने निजी उद्योगपतियों के स्वामित्व में थे और वहाँ काम की दशाएँ बहुत खराब थीं।
3. भूमि व्यवस्था :- किसान अपनी जमीन कम्यून (मीर) को सौंप देते थे, जो बाद में परिवार की जरूरत के अनुसार जमीन बाँटता था।
4. शासन व्यवस्था :- रूस में निरंकुश राजशाही थी, यानी सारी सत्ता जार निकोलस के हाथों में थी।
5. महँगाई :- 1904 ई. में आवश्यक वस्तुओं की कीमतें तेजी से बढ़ने लगीं।
6. मजदूर आंदोलन :- मजदूरों ने संगठन बनाकर अपने अधिकारों और काम की स्थिति में सुधार की माँग करनी शुरू की।
उदाहरण :-
1904 में रूस के सेंट पीटर्सबर्ग शहर में मजदूरों ने वेतन वृद्धि और काम के घंटे घटाने की माँग को लेकर हड़तालें कीं।
प्रश्न :- रूस में समाजवाद का उदय कैसे हुआ?
उत्तर :- रूस में समाजवाद के उदय के निम्नलिखित कारण थे :-
1. मार्क्सवादी विचारधारा का प्रभाव :- मार्क्स के विचारों से प्रेरित समाजवादियों ने 1898 में रशियन सोशल डेमोक्रेटिक वर्कर्स पार्टी की स्थापना की।
2. पार्टी की भूमिका :- इस पार्टी ने अखबार निकालकर मजदूरों को संगठित किया और हड़तालों व आंदोलनों का संचालन किया।
3. ग्रामीण समाजवाद :- 19वीं सदी के अंत तक ग्रामीण इलाकों में भी समाजवादी सक्रिय हो गए थे।
4. समाजवादी क्रांतिकारी पार्टी :- सन 1900 में उन्होंने सोशलिस्ट रेवलूशनरी पार्टी (समाजवादी क्रांतिकारी पार्टी) का गठन किया।
5. किसानों के लिए संघर्ष :- इस पार्टी ने किसानों के अधिकारों की रक्षा और सामंतों की जमीन किसानों को सौंपने की माँग की।
उदाहरण :-
सोशलिस्ट रेवलूशनरी पार्टी ने रूस के ग्रामीण इलाकों में आंदोलन चलाकर किसानों को सामंती जमींदारों के शोषण के खिलाफ संगठित किया।
नोट :-
1914 से पहले रूस में सभी राजनीतिक पार्टियाँ गैरकानूनी मानी जाती थीं।
प्रश्न :- खूनी रविवार किसे कहा जाता है और यह घटना कब हुई?
उत्तर :- खूनी रविवार के विषय में महत्वपूर्ण तथ्य निम्नलिखित है :-
1. घटना का समय :- यह घटना 1905 ईस्वी में रूस में हुई।
2. नेतृत्व :- इस जुलूस का नेतृत्व पादरी गौपॉन ने किया था।
3. उद्देश्य :- मजदूर जार निकोलस द्वितीय को अपनी समस्याओं और मांगों का ज्ञापन देने जा रहे थे।
4. घटना :- जब मजदूरों का जुलूस जार के महल के पास पहुँचा तो सैनिकों ने उन पर गोली चला दी।
5. परिणाम :- इस गोलीकांड में 100 से अधिक मजदूर मारे गए और लगभग 300 मजदूर घायल हुए।
6. महत्व :- इस निर्मम घटना को इतिहास में “खूनी रविवार” (Bloody Sunday) के नाम से जाना गया।
उदाहरण :-
1905 में सेंट पीटर्सबर्ग में मजदूरों पर की गई इस गोलीबारी ने पूरे रूस में जार शासन के खिलाफ व्यापक क्रांति की चिंगारी भड़का दी।
प्रश्न :- रूस में 1905 की क्रांति कैसे हुई और इसके क्या परिणाम हुए?
उत्तर :- रूस में 1905 की क्रांति की शुरुआत :- “खूनी रविवार” की घटना से हुई, जब मजदूरों पर जार की सेना ने गोली चला दी।
इस क्रांति के निम्नलिखित परिणाम हुए :-
1. देशव्यापी असर :- इस घटना के बाद पूरे रूस में हड़तालें और प्रदर्शन शुरू हो गए। विश्वविद्यालय बंद कर दिए गए और मजदूर, किसान, तथा सैनिक सब आंदोलित हो उठे।
2. मध्यवर्ग का समर्थन :- वकीलों, डॉक्टरों, इंजीनियरों और अन्य शिक्षित वर्ग ने भी आंदोलन का समर्थन किया और संविधान सभा की माँग करते हुए “यूनियन ऑफ यूनियन्स” की स्थापना की।
3. जार की प्रतिक्रिया :- दबाव में आकर जार निकोलस द्वितीय ने एक निर्वाचित परामर्शदाता संसद (ड्यूमा) बनाने की घोषणा की।
4. पहली ड्यूमा मात्र 75 दिनों में भंग कर दी गई।
5. दूसरी ड्यूमा भी 3 महीने में समाप्त कर दी गई।
6. तीसरी ड्यूमा में रूढ़िवादी राजनेताओं को शामिल कर जार ने अपनी शक्ति बनाए रखी।
उदाहरण :-
1905 की रूसी क्रांति ने पहली बार लोगों को यह एहसास कराया कि जार की निरंकुश सत्ता को चुनौती दी जा सकती है, और यही आगे चलकर 1917 की रूसी क्रांति की नींव बनी।
प्रश्न :- पहला विश्वयुद्ध और रूसी साम्राज्य का क्या संबंध था?
उत्तर :- 1914 ई. में प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ जो 1918 तक चला। इसमें रूस मित्र राष्ट्रों की ओर से शामिल था और इस युद्ध ने रूस की राजनीति, अर्थव्यवस्था तथा समाज पर गहरा प्रभाव डाला।
इस विषय में महत्वपूर्ण तथ्य निम्नलिखित थे :-
1. युद्ध का प्रारंभ :- 1914 में युद्ध की शुरुआत हुई। दो खेमे बने :-
(i) केंद्रीय शक्तियाँ : जर्मनी, ऑस्ट्रिया, तुर्की
(ii) मित्र राष्ट्र : फ्रांस, ब्रिटेन, रूस
2. युद्ध का विस्तार :- इन देशों के पास विशाल साम्राज्य होने के कारण यह युद्ध यूरोप से बाहर भी फैल गया। इसलिए इसे “प्रथम विश्व युद्ध” कहा गया।
3. रूस की स्थिति :- युद्ध की शुरुआत में रूस की जनता ने सरकार का समर्थन किया। लेकिन जैसे-जैसे युद्ध लंबा खिंचता गया, ड्यूमा (संसद) से सलाह लेना बंद कर दिया गया और जनता का समर्थन घटने लगा।
4. शहर का नाम परिवर्तन :- लोगों ने “सेंट पीटर्सबर्ग” का नाम बदलकर पेत्रोग्राद रख दिया क्योंकि पहला नाम जर्मन भाषा का था।
5. युद्ध के परिणाम :- 1914 से 1916 के बीच रूस को जर्मनी और ऑस्ट्रिया से भारी पराजय झेलनी पड़ी। 1917 तक लगभग 70 लाख सैनिक मारे जा चुके थे। पीछे हटती सेनाओं ने रास्ते की फसलें और इमारतें जला दीं ताकि दुश्मन उनका उपयोग न कर सके। इसके कारण 30 लाख लोग शरणार्थी बन गए।
नोट :-
प्रथम विश्व युद्ध के कारण रूस में आर्थिक संकट, भुखमरी और राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी, जिसने आगे चलकर 1917 की रूसी क्रांति की नींव रखी।
प्रश्न :- फरवरी क्रांति के क्या कारण थे?
उत्तर :- फरवरी क्रांति :- फरवरी 1917 में रूस में एक बड़ी क्रांति हुई जिसे फरवरी क्रांति कहा गया। इस क्रांति ने जार निकोलस द्वितीय की राजशाही को समाप्त कर दिया।
फरवरी क्रांति के निम्नलिखित मुख्य कारण थे :-
1. प्रथम विश्व युद्ध का लंबा खिंचना :- युद्ध कई वर्षों तक चला जिससे रूस की अर्थव्यवस्था कमजोर हो गई और जनता में असंतोष फैल गया।
2. रासपुतिन का प्रभाव :- दरबार में रासपुतिन नामक व्यक्ति का अत्यधिक प्रभाव बढ़ गया था, जिससे जनता में राजघराने के प्रति अविश्वास बढ़ा।
3. सैनिकों का मनोबल गिरना :- लगातार हार और मौतों के कारण सैनिकों का मनोबल टूट गया और वे लड़ाई से भागने लगे।
4. शरणार्थियों की समस्या :- युद्ध के कारण लाखों लोग अपने घरों से विस्थापित होकर शरणार्थी बन गए, जिससे शहरों पर दबाव बढ़ा।
5. खाद्यान्न की कमी :- फसलों के नष्ट होने और परिवहन की कठिनाइयों के कारण शहरों में भोजन की भारी कमी हो गई।
6. उद्योगों का बंद होना :- युद्ध के चलते कच्चे माल की कमी और आर्थिक संकट से कई कारखाने बंद हो गए।
7. सैनिकों की मृत्यु :- लाखों रूसी सैनिक युद्ध में मारे गए, जिससे जनता में क्रोध और निराशा फैल गई।
उदाहरण :-
1917 में पेत्रोग्राद (सेंट पीटर्सबर्ग) में महिलाओं और मजदूरों ने भोजन की कमी और युद्ध की तबाही के खिलाफ प्रदर्शन किए — इन्हीं प्रदर्शनों ने फरवरी क्रांति का रूप ले लिया।
प्रश्न :- फरवरी क्रांति की मुख्य घटनाएँ क्या थीं?
उत्तर :- फरवरी क्रांति की मुख्य घटनाएँ निम्नलिखित मुख्य कारण थीं :-
1. 22 फरवरी 1917 :- पेत्रोग्राद की एक फैक्ट्री में तालाबंदी (Lockout) की गई। इससे असंतोष फैल गया और 50 अन्य फैक्ट्रियों के मजदूर भी हड़ताल पर चले गए।
2. 23-24 फरवरी :- हड़ताली मजदूरों ने सरकारी इमारतों और सड़कों पर प्रदर्शन शुरू कर दिया। भीड़ ने “रोटी दो, युद्ध खत्म करो” जैसे नारे लगाए।
3. 25 फरवरी :- हालात बेकाबू होते देख जार ने कर्फ्यू लगवाया और ड्यूमा को बर्खास्त कर दिया।
4. 27 फरवरी :- प्रदर्शनकारियों ने सरकारी इमारतों पर कब्जा कर लिया। सैनिकों ने भी जनता का साथ दिया और अपने अधिकारियों की आज्ञा मानने से इनकार कर दिया।
5. सोवियत का गठन :- मजदूरों और सैनिकों ने मिलकर सोवियत (संगठन) का गठन किया, जो आगे चलकर सत्ता का केंद्र बना।
6. 2 मार्च 1917 :- सैनिक कमांडरों की सलाह पर जार निकोलस द्वितीय ने गद्दी छोड़ दी। इस तरह जारशाही का अंत हुआ और रूस में अस्थायी सरकार की स्थापना हुई।
उदाहरण :-
पेत्रोग्राद की सड़कों पर मजदूरों और सैनिकों के प्रदर्शनों ने रूस की राजनीति की दिशा ही बदल दी — यही घटनाएँ फरवरी क्रांति कहलाती हैं।
प्रश्न :- फरवरी क्रांति के क्या प्रभाव हुए?
उत्तर :- फरवरी 1917 की क्रांति ने रूस की राजनीतिक व्यवस्था में बड़ा परिवर्तन किया। इस क्रांति ने जारशाही का अंत कर दिया और लोकतंत्र की दिशा में नए युग की शुरुआत की।
फरवरी क्रांति के मुख्य प्रभाव निम्नलिखित थे :-
1. जारशाही का अंत :- फरवरी क्रांति के परिणामस्वरूप जार निकोलस द्वितीय को गद्दी छोड़नी पड़ी। रूस में सदियों पुरानी राजशाही व्यवस्था समाप्त हो गई।
2. अस्थायी सरकार का गठन :- सत्ता अस्थायी (अंतरिम) सरकार के हाथों में आई, जिसमें ड्यूमा और सोवियत दोनों के नेता शामिल थे।
3. संविधान सभा के चुनाव की घोषणा :- अंतरिम सरकार ने सार्वभौमिक व्यस्क मताधिकार (Universal Adult Franchise) के आधार पर संविधान सभा के चुनाव कराने की घोषणा की।
4. राजनीतिक स्वतंत्रता :- लोगों को बोलने, लिखने, सभा करने और संगठन बनाने की स्वतंत्रता दी गई।
उदाहरण :-
फरवरी क्रांति के बाद रूस में राजशाही खत्म हुई और अंतरिम सरकार की स्थापना के साथ लोकतंत्र की दिशा में पहला कदम उठाया गया।
प्रश्न :- अप्रैल थीसिस क्या थी और इसकी प्रमुख माँगें क्या थीं?
उत्तर :- अप्रैल थीसिस :- अप्रैल 1917 में महान बोल्शेविक नेता व्लादिमीर लेनिन रूस लौटे और उन्होंने अपने प्रसिद्ध विचार प्रस्तुत किए, जिन्हें “अप्रैल थीसिस” कहा गया।
इसमें उन्होंने रूस के भविष्य के लिए निम्नलिखित तीन प्रमुख माँगें रखीं :-
1. युद्ध की समाप्ति :- लेनिन ने मांग की कि रूस को प्रथम विश्व युद्ध से तुरंत बाहर निकलना चाहिए, क्योंकि इससे जनता को केवल दुख और विनाश मिल रहा था।
2. सारी जमीनें किसानों के हवाले :- लेनिन का मत था कि सामंतों और जमींदारों की सारी जमीनें छीनकर किसानों में बाँट दी जाएँ, ताकि भूमि पर समान अधिकार हो।
3. बैंकों का राष्ट्रीयकरण :- उन्होंने कहा कि सभी निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण (सरकारी नियंत्रण) किया जाए ताकि आर्थिक संसाधन जनता के हित में उपयोग हों।
उदाहरण :-
लेनिन के इन सिद्धांतों ने रूसी जनता और मजदूरों में नया जोश भर दिया और बाद में अक्टूबर क्रांति (1917) की नींव तैयार की।
प्रश्न :- अक्टूबर क्रांति क्या थी?
उत्तर :- अक्टूबर क्रांति :- रूस में वह ऐतिहासिक आंदोलन था जिसमें फरवरी 1917 की राजशाही के पतन के बाद अक्टूबर 1917 में बोल्शेविकों ने सत्ता अपने हाथ में ले ली।
अक्टूबर क्रांति के विषय में मुख्य तथ्य निम्नलिखित थे :-
1. क्रांति की शुरुआत :- 24 अक्टूबर 1917 को पेत्रोग्राद (सेंट पीटर्सबर्ग) में विद्रोह शुरू हुआ।
2. बोल्शेविकों का नियंत्रण :- शाम तक पूरा पेत्रोग्राद शहर बोल्शेविकों के नियंत्रण में आ गया।
3. राजशाही का अंत :- इस क्रांति के साथ रूस में अंतरिम सरकार का पतन हुआ और लेनिन के नेतृत्व में समाजवादी शासन की स्थापना हुई।
4. सत्ता का हस्तांतरण :- “सारी सत्ता सोवियतों को” के नारे के साथ मजदूरों और सैनिकों की समितियों (सोवियतों) ने शासन संभाला।
नोट :-
अक्टूबर 1917 की यह क्रांति ही आगे चलकर सोवियत संघ (USSR) की स्थापना का कारण बनी, जो विश्व का पहला समाजवादी राष्ट्र था।
प्रश्न :- अक्टूबर क्रांति के बाद रूस में क्या परिवर्तन हुए?
उत्तर :- अक्टूबर 1917 की क्रांति के बाद रूस में समाजवादी सिद्धांतों पर आधारित कई महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए, जिनसे देश की राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज पूरी तरह बदल गया।
अक्टूबर क्रांति के बाद रूस में निम्नलिखित महत्वपूर्ण परिणाम हुए :-
1. निजी संपत्ति का अंत :- सभी निजी संपत्तियों को समाप्त कर दिया गया।
2. बैंकों और उद्योगों का राष्ट्रीयकरण :- बैंक और बड़े उद्योग अब सरकार के नियंत्रण में आ गए।
3. जमीनों का सामाजिककरण :- सारी जमीनें अब किसानों की न होकर सामाजिक संपत्ति घोषित कर दी गईं।
4. अभिजात्य वर्ग का अंत :- पुराने अभिजात्य (राजा-रईस) वर्ग की उपाधियाँ और विशेषाधिकार खत्म कर दिए गए।
5. एक-दलीय शासन की स्थापना :- बोल्शेविक पार्टी ही एकमात्र शासक दल बन गई।
6. सेंसरशिप लागू :- समाचार पत्रों और अभिव्यक्ति पर सरकारी नियंत्रण (सेंसरशिप) लगाया गया।
7. गृह युद्ध की शुरुआत :- बोल्शेविकों और उनके विरोधियों के बीच गृह युद्ध छिड़ गया।
उदाहरण :-
अक्टूबर क्रांति के बाद लेनिन की सरकार ने “सारी संपत्ति जनता की” नीति लागू की, जिससे रूस एक पूंजीवादी देश से समाजवादी देश बन गया।
प्रश्न :- अक्टूबर क्रांति के बाद रूस में गृह युद्ध क्यों हुआ और इसमें कौन-कौन शामिल थे?
उत्तर :- अक्टूबर क्रांति के बाद रूस में सत्ता को लेकर कई समूहों के बीच संघर्ष हुआ। यही संघर्ष गृह युद्ध कहलाया। यह समाजवादी (बोल्शेविक) सरकार और उसके विरोधी दलों के बीच लड़ा गया।
इस विषय में महत्वपूर्ण तथ्य निम्नलिखित थे :-
1. गृह युद्ध की शुरुआत :- क्रांति के बाद रूस में तीन प्रमुख समूह बन गए :-
(i) बोल्शेविक (रेड्स)
(ii) सामाजिक क्रांतिकारी (ग्रीन्स)
(iii) जार समर्थक (व्हाइट्स)
2. बोल्शेविक (रेड्स) :- ये लेनिन के समर्थक थे और समाजवादी शासन स्थापित करना चाहते थे।
3. ग्रीन्स :- ये किसान समूह थे जो बोल्शेविकों और जार दोनों के विरोधी थे।
4. व्हाइट्स :- ये जार समर्थक और पूंजीवादी वर्ग थे, जो पुराने शासन को वापस लाना चाहते थे।
5. विदेशी सहायता :- फ्रांस, अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों ने ग्रीन्स और व्हाइट्स का समर्थन किया क्योंकि वे समाजवादी शासन से डरते थे।
नोट :-
1918 से 1920 तक चले इस गृह युद्ध में बोल्शेविकों ने अंततः विजय प्राप्त की और रूस में समाजवादी शासन पूरी तरह स्थापित हो गया।